राष्ट्रीय कुंठा
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1924 में गांधी जी के जेल से छूटने पर हकीम अजमल खां द्वारा संचालित यूनानी चिकित्सा पद्धति के तिब्बिया कालेज में जब उनके सम्मान में समारोह हो रहा था तो उस समय एक उल्लेखनीय घटना हुई। रिपोर्ट [†] के अनुसार एक हिंदू विद्यार्थी ने गांधी जी की हज़रत ईसा (जीसस) से तुलना कर दी। इस अपवित्र तुलना से मुसलमानों की भावनाएं भड़क उठीं और मुसलमान विद्यार्थियों ने उस हिंदू छात्र को मारने पीटने की धमकी दी। यह भी कहा गया कि इसमें मुस्लिम प्राध्यापकों ने भी अपने सहधर्मियों का साथ दिया।
1923 में श्री मुहम्मद अली ने भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रस की अध्यक्षता की। अपने भाषण में उन्होंने श्री गांधी के बारे में कहाः
फ्बहुत से लोगों ने महात्मा के उपदेशों और हाल में भोगी गयी उनकी
यातनाओं की जीसस (जिन्हें शांति मिलें) से तुलना की......। जीसस ने
जब अपनी सेवा के प्रारंभ में अपनी दुनिया का ध्यान किया तो सुधार करने
वाले साधनों के चयन का भी उनसे आवाह्न किया गया....करुणा और
त्याग से सर्वशक्तिमान होने की धारणा और हृदय की शुद्धता से शक्ति पर
विजयी होना उतना ही प्राचीन है, जितना कि अबेल और केन का समय,
जिन्हें कि मानव-सृष्टि का प्रथम वंशज कहा जा सकता है......।
फ्जो भी हो, यह महात्मा गांधी के लिए भी उतना ही विचित्र था।
परंतु ईसाई सरकार ने हमारे युग के ईसा जैसे एक सामान्य इंसान को
अपराधी माना (शर्म, शर्म) और उस व्यक्ति को शांति भंग करने के लिए
दंडित किया जो जनता के कार्य में तल्लीन है और बिलकुल शांतिदूत समान
है। महात्मा के आगमन से पहले भारत की राजनीतिक स्थिति वैसी ही थी
जैसी ईसा मसीह के आने से पूर्व जूडिया की थी और उन्होंने भारत के
स्वस्थ होने के लिए वही निदान बताया जो ईसा मसीह ने जूडिया के लिए
बताया था। वेदना द्वारा आत्मशुद्धि, सरकार का उत्तरदायित्व संभालने के लिए
नैतिक तैयारी, स्वराज-प्राप्ति के लिए एक बुनियादी शर्त आत्मानुशासन। यह
ही महात्मा का पथ और विश्वास था_ और इसमें से उन लोगों ने, जिन्हें
उस कीर्तिमान वर्षा में जीने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है जिसका दिग्दर्शन
कांगे्रस के अहमदाबाद अधिवेशन के रूप में परिलक्षित हुआ, यह देखा है
कि इतने विशाल जन-समूह के विचारों, भावनाओं और कार्यों में कितना
उल्लेखनीय और द्रुत परिवर्तन हुआ है।य्
† वही, 21-3-1924