राष्ट्रीय कुंठा
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क्षमता ही क्या है? मुसलमानों ने शासन किया है और मुसलमान ही शासन
करेंगे।य्
हिंदुओं का शासन मानने के बजाय मुसलमान फिर से हिंदुओं के साथ प्रतिस्पर्धा करते प्रतीत होते हैं। सन् 1926 में एक विवाद उठा कि 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में वास्तव में किसकी विजय हुई थी? मुसलमानों का तर्क था कि वह अहमदशाह अब्दाली की महान विजय थी, क्योंकि उसके पास केवल एक लाख सिपाही थे, जब कि मराठों की सेना में 4 से 6 लाख तक सिपाही थे। हिंदुओं का जवाब था कि यह उनकी ही विजय थी, क्योंकि इसके बाद लगातार होने वाले मुस्लिम आक्रमण रुक गए। परंतु मुसलमान हिंदुओं से हार मानने को तैयार नहीं थे, क्योंकि वे अपने आपको हिंदुओं से श्रेष्ठ मानते थे और कहते थे कि वे हमेशा हिंदुओं से श्रेष्ठ साबित होंगे। यह सिद्ध करने के लिए कि मुसलमान हमेशा ही हिंदुओं से श्रेष्ठ होते हैं, नजीबाबाद के एक मौलाना अकबर शाह खान ने बड़ी गंभीरता से कहा कि हिंदुओं और मुसलमानों का चौथा युद्ध विशेष शर्तों के तहत उसी भाग्य-निर्णायक पानीपत के मैदान में होना चाहिए। तदनुसार मौलाना ने पं. मदन मोहन मालवीय को निम्न शब्दों में चुनौती दीः
फ्मालवीय जी, यदि आप पानीपत के युद्ध के नतीजे को गलत साबित
करने का प्रयत्न कर रहे हैं तो मैं इस तथ्य के परीक्षण का एक आसान
और शानदार तरीका बताता हूं। आप अपने सर्वविदित प्रभाव से बरतानिया
सरकार से कहें कि वह पानीपत का चौथा युद्ध होने दें, ताकि यह हुकूमत
के बिना लड़ा जा सके। मैं हिंदुओं और मुसलमानों के पराक्रम और
साहस का तुलनात्मक तथ्य प्रस्तुत करने को तैयार हूं। जैसे भारत में 7
करोड़ मुसलमान हैं और मैं निर्धारित तिथि को पानीपत के मैदान में 700
मुसलमानों को लेकर आऊंगा, इसी प्रकार चूंकि भारत में 22 करोड़ हिंदू
हैं, इसलिए मैं मैदान में 2200 हिंदुओं को लेकर आने की आपको छूट
देता हूं। यह उचित होगा कि तोप, मशीनगनों और बमों का प्रयोग न करके
केवल तलवारों, बरछों, भालों धनुषबाणों और कटारों का ही प्रयोग किया
जाए और यदि आप सेनानायक के पद में किसी हिंदू को शामिल करना
चाहें तो सदाशिवराव या विश्वासरावऽ के किसी वंशज को ले सकते हैं,
ताकि वे 1761 ई. में अपने पूर्वजों की हार का बदला लेने का मौका पा
सकें। लेकिन आप कृपया दर्शक बन कर जरूर आइए, क्योंकि युद्ध का
ऽ हिंदुओं की तरफ से ये दोनों पानीपत के तीसरे युद्ध में सेनानायक थे।