12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 317

308 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

नतीजा देखने के बाद आपको अपना विचार बदलना पड़ सकता है, और

मैं समझता हूं कि इस देश में जो अंतर्द्वंद्व एवं कलह चल रहा है, वह

खत्म हो जाएगा। अंत में, मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि इन 700

मुसलमानों में मैं पठानों या अफगानों को नहीं लाऊंगा, क्योंकि आप लोग

उनसे प्रायः आतंकित रहते हैं। अतः मैं अपने साथ केवल अच्छे भारतीय

मुसलमान परिवारों के मुसलमानों को ही लेकर आऊंगा, जो शरीयत के

कट्टर अनुयायी हैं।’ऽ

IV

तो, हिंदुओं और मुसलमानों के धार्मिक विश्वास, सामाजिक दृष्टिकोण, मूल नियति और उनकी सांप्रदायिक और राजनीतिक अभिव्यक्तियां ऐसी हैं। ये धार्मिक एवं सामाजिक विश्वास उनके अपने भविष्य के बारे में उनकी इस मनोदशा को इंगित करते हैं कि क्या वे आपस में लड़ते रहेंगे का पे्रम अथवा सहयोगपूर्ण ढंग से रह सकेंगे? अतीत का अनुभव बताता है कि इनमें सामंजस्य नहीं हो सकता। इनमें इतनी असमानताएं एवं भेदभाव हैं कि ये एक राष्ट्र के रूप में अथवा एक राष्ट्र के दो समुदायों के रूप में पे्रम एवं सद्भावना के माहौल में कभी नहीं रह सकते। इन आपसी भिन्नताओं एवं मतभेदों के कारण अलग-अलग रहने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता, बल्कि ये कारण इनको युद्ध की स्थिति में ही रखते हैं। ये मतभेद स्थाई हैं और हिंदू-मुसलमानों की समस्या चिरस्थाई है। इन समस्याओं का यह सोचकर निदान करने की कोशिश करना कि हिंदू और मुसलमान एक हैं, और यदि अभी एक नहीं भी हैं तो बाद में एक हो जाएंगे, एक निष्फल प्रयास है, ऐसा निष्फल प्रयास जैसा कि चेकोस्लोवाकिया के मामले में सिद्ध हुआ है। इसलिए अब समय आ गया है जब कुछ तथ्यों को हमें निर्विवाद रूप से स्वीकार करना होगा, चाहे उनको मानना हमारे लिए कष्टकर ही क्यों न हो।

सर्वप्रथम हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि हिंदुओं और मुसलमानों को एक करने के लिए यथासंभव सभी प्रयास कर लिए गए हैं, पर वे सभी निष्फल हुए हैं।

इन प्रयासों का इतिहास 1909 से शुरू हुआ माना जा सकता है। मुस्लिम प्रतिनिधिमंडल की मांगें यदि अंगे्रजों ने स्वीकार कर ली होतीं, तो हिंदुओं ने भी उनके लिए अपनी सहमति दे दी होती और इनमें प्रमुख थे श्री गोखले। अनेक हिंदुओं ने उनकी आलोचना की कि उन्होंने पृथक निर्वाचन के सिद्धांत को अपनी सहमति दी।

ऽ थू्र इंडियन आइज़, टाइम्स ऑफ इंडियन, 20-6-36