राष्ट्रीय कुंठा
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इन संशोधनों से स्पष्ट है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खाई ज्यादा चौड़ी नहीं थी। फिर भी इस खाई को पाटने की कोई इच्छा उनमें नहीं थी। जो काम हिंदू और मुस्लिम करने में विफल रहे, वह अंगे्रजों के लिए छोड़ दिया गया और उन्होंने यह काम कम्यूनल अवार्ड द्वारा किया।
हिंदुओं और दलित वर्गों के बीच, ‘पूना पैक्ट’ हो जाने से एकता ख्1, के लिए हो रहे प्रयत्नों को और बल मिला। नवंबर और दिसंबर 1932 में हिंदुओं और मुसलमानों ने समझौता करने के लिए अपनी ओर से पूरी कोशिश की। मुस्लिम अपनी सर्वदलीय कांफ्रेंस में तथा हिंदू, मुसलमान और सिख एकता कांफ्रेंस में मिले। प्रस्ताव और प्रति-प्रस्ताव आए, परंतु अवार्ड को पैक्ट में बदलने को लेकर कोई नतीजा नहीं निकला और समिति को अंततः 23 बैठकों के बाद इन प्रयासों को त्यागना पड़ा।
जिस तरह राजनीतिक प्रश्नों पर एकता लाने के लिए प्रयास चल रहे थे, उसी तरह सामाजिक और धार्मिक प्रश्नों पर भी एकता लाने के प्रयास किए गए। उदाहरण के लिए - 1. गो-हत्या, 2. मसजिदों के सामने संगीत बजाना, और 3. धर्म-परिवर्तन। परन्तु इन पर मतभेद बने रहे। इस दिशा में पहला प्रयत्न 1923 में भारतीय राष्ट्रीय पैक्ट का प्रस्ताव प्रस्तुत करते समय किया गया। यह असफल रहा। श्री गांधी उस समय जेल में थे। श्री गांधी को जेल से 5 फरवरी, 1924 को रिहा किया गया। अपने प्रयासों की इस प्रकार खिलाफत से हतप्रभ होकर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच होते रहे घातक दंगों के लिए अपने आपको नैतिक रूप से जिम्मेदार मानते हुए श्री गांधी ने 21 दिन का उपवास करने का निर्णय लिया। सभी समुदायों के प्रमुख भारतीयों को एकता-सम्मेलन में एकत्रित करने के लिए उपवास के अवसर का लाभ उठाया गया। ख्2, इसमें कलकत्ता के मेट्रोपोलिटन ने भी भाग लिया। 26 सितंबर से 2 अक्तूबर, 1924 तक सम्मेलन की लंबी बैठकें हुईं। उनमें मौजूद सदस्यों ने शपथ ली कि वे अपनी अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के अनुपालन के लिए भरपूर प्रयत्न करेंगे तथा किसी उत्तेजना में नहीं आएंगे। श्री गांधी की अध्यक्षता में एक केंद्रीय राष्ट्रीय पंचायत गठित की गई। सम्मेलन ने धार्मिक विश्वासों की स्वीकृति तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक रिवाजों का पालन करने संबंधी धार्मिक स्थानों की पवित्रता, गो-हत्या, मस्जिदों के सामने बाजा बजाने आदि के बारे में कुछ मौलिक अधिकार प्रतिपादित किए, और उन अधिकारों की सीमा निर्धारित करने के लिए एक वक्तव्य जारी किया। एकता-सम्मेलन से दोनों समुदायों के बीच शांति स्थापित नहीं की जा सकी, पर इससे आए-दिन होने वाले दंगों की गति धीमी पड़ी।
- इन प्रयासों के विवरण के लिए देखें, दि इंडियन क्वार्टरली रजिस्टर, 1932, खंड 2, पृ. 296
- पट्टामि सीतारमैया - हिस्ट्री आफ द कांगे्रस, पृ. 532