316 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
1925 और 1926 के बीच सांप्रदायिक दंगे पहले की अपेक्षा और अधिक भीषण तथा
खतरनाक रूप से पुनः भड़क उठे। इन दंगों से क्षुब्ध होकर लॉर्ड इर्विन ने, जो उस समय भारत के वायसराय थे, 29 अगस्त, 1927 को केंद्रीय विधान सभा में अपने भाषण में दोनों समुदायों से अपील की कि वे दंगे न करें और शांति स्थापित करें। लॉर्ड इर्विन की इस अपील के बाद एक दूसरा एकता-सम्मेलन हुआ, जो शिमला एकता कांफ्रेंस के नाम से जाना गया। ख्1, इस एकता-सम्मेलन की बैठक 30 अगस्त 1927 को हुई, जिसमें दोनों समुदायों से अपील की गई कि वे किसी संतोषजनक हल पर पहुंचने के लिए अपने नेताओं की मदद करें। श्री जिन्ना की अध्यक्षता में 16 से 22 सिंतबर तक शिमला में हुए सम्मेलन में एक एकता-समिति गठित की गई। गो-हत्या और मस्जिदों के सामने बाजा बजाने के मूल प्रश्नों पर कोई निष्कर्ष नहीं निकला और समिति के सामने प्रस्तुत अन्य मुद्दों को तो छुआ ही नहीं गया। कुछ सदस्यों को लगा कि समिति विघटित ही न हो जाए। समिति के हिंदू सदस्यों ने दबाव डाला कि समिति की अगली बैठक किसी अन्य तिथि को हो। मुस्लिम सदस्य पहले तो एकमत नहीं हुए, परंतु अंत में उन्होंने समिति को भंग करने का निर्णय किया और अध्यक्ष से निवेदन किया कि वे समिति की बैठक उस दशा में बुला सकते हैं, यदि उन्हें 6 हफते में निर्धारित ग्यारह सदस्यों से आवेदन प्राप्त हो जाए। इस तरह का अनुरोध न कभी आया और न समिति की बैठक हुई।
शिमला-सम्मेलन के असफल होने पर कांगे्रस के तत्कालीन अध्यक्ष श्री श्रीनिवास आयंगर ने हिंदुओं और मुसलमानों का विशेष सम्मेलन बुलाया, जिसकी बैठक 27 और 28 अक्तूबर, 1927 को कलकत्ता में हुई। यह कलकत्ता एकता सम्मेलन ख्2, के नाम से जाना गया। सम्मेलन में तीन ज्वलंत प्रश्नों पर कुछ संकल्प पारित किए गए। परंतु उन संकल्पों को समर्थन नहीं मिला, क्योंकि न तो हिंदू महासभा और न ही मुस्लिम लीग का प्रतिनिधित्व उसमें था।
एक समय ऐसा कहना संभव था कि हिंदू-मुस्लिम एकता एक आदर्श है जो न केवल पूरा किया जाए, बल्कि पूरा किया जा सकता है_ और नेताओं को दोषी ठहराया गया कि उन्होंने इस दिशा में ठोस प्रयत्न नहीं किए। ऐसे विचार 1911 में मौलाना मुहम्मद अली तक के थे, जिन्होंने तब हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए कोई
खास प्रयत्न नहीं किए थे। 14 जनवरी, 1911 के ‘कामरेड’ में लिखते हुए श्री मुहम्मद
- इस सम्मेलन के कार्यवाही-वृत्तांत के लिए देखें - दि इंडियन क्वार्टरली रजिस्टर, खंड-2, पृ. 39-50
- वही, पृ. 50-58