12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 326

राष्ट्रीय कुंठा

अली ने कहा थाः

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फ्हमें इस बात में कोई आस्था नहीं है कि भारत एक है। यदि भारत एक

होता तो इस वर्ष की कांगे्रस में अध्यक्ष को उनके सुदूर घर से घसीटने

की क्या जरूरत थी? दावत की कल्पना मात्र से भूख शांत नहीं हो

जाती। हमारा विश्वास उस पाखंड में अब भी नहीं है, जो अपनी सूक्ष्म

कीमियागिरी से लालच भरे एकाधिकार को उत्कट देशपे्रम में बदल देता

है......जिस व्यक्ति से हम सर्वाधिक पे्रम करते हैं, सर्वाधिक भयभीत होते

हैं और सबसे कम विश्वास करते हैं। वह हैं एक अधीर आदर्शवादी। गोथे

ने बायरन के बारे में कहा है कि वह एक विलक्षण कवि था, लेकिन

वह बच्चों की तरह सोचता था। जो व्यक्ति आदर्शवादी भी होता है और

अधीर भी उसके बारे में हमारी यही राय है। इस अशांत भूमि पर एकता

की अच्छी-बुरी कई कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं। अतः हम दूसरी बेकार

कोशिश नहीं कर सकते। हमें टूटे हुए शीशे के टुकड़ों को गोंद से जोड़ने

की गलती नहीं करनी चाहिए और न ही कांच के टुकड़ों को दोष देना

चाहिए। दूसरे शब्दों में, हम स्थिति का डटकर मुकाबला करने का प्रयत्न

करेंगे, और तथ्यों को, चाहे वे कितने ही कुरूप या प्रतिकूल क्यों न हों,

समझेंगे। प्रतिकूल परिस्थितियों को अनदेखा करना कमजोर राजनीति है,

और लोगों के दिलो-दिमाग में बैठे पूर्वाग्रहों को ईमानदारी से समझना और

उन्हें विभाजित करने वाली खाइयों को पाटकर एकता हासिल करना कम

महत्वपूर्ण नहीं है।’’ऽ

गत 30 वर्षों के इतिहास को देखकर कोई भी यह सवाल उठा सकता है कि क्या हिंदू-मुस्लिम एकता हासिल हो सकी है? क्या इसकी प्राप्ति के लिए प्रयत्न नहीं किए गए हैं? और क्या कोई प्रयत्न करना बाकी रह गया है? पिछले 30 वर्षों का इतिहास दर्शाता है कि हिंदू-मुस्लिम एकता प्राप्त नहीं हुई है। इसके विपरीत उनमें बहुत बड़ा भेद है। एकता के लिए लगातार और निष्ठापूर्ण प्रयत्न किए गए हैं और अब कुछ करने को शेष नहीं है, सिवाय इसके कि एक पार्टी दूसरे के सामने आत्मसमर्पण कर दें। यदि कोई व्यक्ति, जो आशावादी नहीं है और उसका आशावादी होना न्यायसंगत न हो, यह कहे कि हिंदू-मुस्लिम एकता

ऽ सन् 1923 में काकीनाडा कांगे्रस सम्मेलन में अध्यक्षीय भाषण से उद्धृत।