12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 327

318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

एक मृगतृष्णा की तरह है और एकता के विचार को छोड़ देना चाहिए, तो कोई भी उसे निराशावादी या अधीर आदर्शवादी कहने का साहस नहीं कर सकता। यह हिंदुओं पर निर्भर करता है कि तमाम दुर्भाग्यपूर्ण प्रयत्नों के बावजूद वे अब भी एकता की कोशिश करेंगे या इस कोशिश को छोड़कर एकता का कोई और आधार तलाश करेंगें।

दूसरी ओर, इस बात को स्वीकारना होगा कि मुसलमानों की विचारधारा में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ है। कितना भारी परिवर्तन हुआ है, यह उन बयानों में दृष्टिगोचर होता है जो उनके द्वारा समय-समय पर द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत पर और उनकी इस सोच पर कि हिंदू-मुस्लिम समस्या का एकमात्र समाधान पाकिस्तान बनाना है, दिए गए। इन सब में श्री जिन्ना का नाम अग्रणी है। उनके विचारों का यह परिवर्तन चौंकाने वाला नहीं, तो दृष्टव्य अवश्य है। उनके वैचारिक परिवर्तनों को समझने के लिए उनके वक्तव्यों की प्रकृति और विस्तार को जानना जरूरी है, ताकि उनकी तुलना उनके उन वक्तव्यों से की जा सके जो वे अब दे रहे हैं।

उनके विगत वक्तव्यों का अध्ययन 1906 से शुरू किया जा सकता है, जब मुस्लिम समुदाय के नेतागण लॉर्ड मिंटो से मिले और उन्होंने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की। उल्लेखनीय है कि उस समय श्री जिन्ना मुस्लिम प्रतिनिधि-मंडल के सदस्य नहीं थे, लेकिन इस तथ्य की जानकारी नहीं है कि क्या उन्हें इसके लिए आमंत्रित किया गया था अथवा नहीं, और क्या उन्होंने इस आमंत्रण को ठुकरा दिया था। परंतु यह स्पष्ट है कि उस समय उन्होंने मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग को, जबकि 1906 में यह रखी गई थी, समर्थन नहीं दिया था।

श्री जिन्ना ने 1918 में इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल से रोलट एक्टऽ के विरोध में इस्तीफा दे दिया। अपना इस्तीफा देते हुए श्री जिन्ना ने कहाः

फ्मैं समझता हूं कि वर्तमान परिस्थितियों में मैं इस काउंसिल में अपने

लोगों के लिए उपयोगी नहीं हूं और न ही व्यक्तिगत स्वाभिमान को रखते

हुए मेरा इस सरकार के साथ, जो इस सदन में जनता के प्रतिनिधियों और

सदन के प्रति आम जन-भावनाओं का आदर नहीं करती, सहयोग संभव

है।य्

ऽ कौंसिल के भारतीय सदस्यों के विरोध के बावजूद विधेयक को पारित करके कानून में बदल दिया गया।

वह 1919 का अधिनियम बना, जिसे ‘एनार्कियल एंड रेवोल्यूशनरी टाइम्स एक्ट’ कहा गया।