अधःपतन से मुक्ति
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होने की कोई आवश्यकता नहीं है और ऐसी संभावनाएं थीं कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग एकजुट होकर कार्य करेंगी। किंतु हिंदू प्रांतों में दो वर्ष और तीन माह के कांग्रेस शासन ने उन्हें पूरी तरह निराश कर कांग्रेस का कट्टठ्ठर शत्रु ही बना दिया। 22 दिसंबर, 1939 को मनाया गया मुक्ति दिवस उनके रोष की गहनता का परिचायक था। गोलमेज सम्मेलन में जो मुसलमान स्वराज्य की मांग में सहयोगी थे वही आज स्वराज के कट्टठ्ठर विरोधी बन गए थे।
कांग्रेस ने ऐसा क्या किया है जिससे मुसलमान उसके इतने अधिक विरोधी हो गए? मुस्लिम लीग का दावा है कि कांग्रेसी शासन के तहत मुसलमानों का वस्तुतः दमन हुआ है और उनका उत्पीड़न हुआ है। लीग ने इस मामले की जांच करने और अपनी रिपोर्ट देने के लिए दो समितियां नियुक्त की गई बताई हैं। किंतु इन मामलों के अलावा, जिनकी जांच एक निष्पक्ष न्यायाधिकरण द्वारा की जानी अपेक्षित है, दो बातें असंदिग्ध तौर पर सामने आईं, जिनसे संघर्ष हुआ (1) कांग्रेस द्वारा मुसलमानों के एकमात्र प्रतिनिधि संगठन के रूप में मुस्लिम लीग को मान्यता देने से इंकार_ (2) कांग्रेस शासित प्रांतों में कांग्रेस का मिले-जुले मंत्रिमंडलों का गठन करने से इंकार।
जहां तक पहला सवाल है, कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने कठोर रूप अपनाया ळै। कांग्रेस मुस्लिम लीग को अहरारों, दि नेशनल मुस्लिम तथा जमीयत-उल-उलेमा जैसे अनेक मुस्लिम राजनीतिक संगठनों में से एक मानने को तैयार है, किंतु इसे वह मुसलमानों का एकमात्र प्रतिनिधि संगठन नहीं मानती। दूसरी ओर मुस्लिम लीग तब तक किसी विचार-विमर्श में शामिल होने को तैयार नहीं है जब तक कि कांग्रेस उसे भारत के मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि संस्था नहीं मान लेती। लीग के इस दावे को हिंदू अतिरेकी बताते हैं और उसे हास्यास्पद जताने का प्रयास करते हैं। मुसलमान कह सकते हैं। कि यदि हिंदू यह जांच-पड़ताल करना बंद कर दें कि राष्ट्रों के बीच संधियां कैसे होती हैं तो उन्हें अपने दृष्टिकोण की मूर्खता का अहसास हो जाएगा। यह दलील भी दी जा सकती है कि जब कोई राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के साथ संधि करने के लिए आगे बढ़ता है, तो वह दूसरे राष्ट्र की सरकार को पूर्ण प्रतिनिधित्व करने वाली स्वीकार करता है। किसी भी देश में विद्यमान कोई सरकार समग्र जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करती, सभी जगह बहुमत का ही प्रतिनिधित्व करती है। परंतु राष्ट्र केवल इसी कारण अपने विवादों को निपटाना अस्वीकार नहीं कर देते कि सरकारें, जो लोगों का प्रतिनिधित्व करती हैं, संपूर्ण जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। यदि एक सरकार अपने यहां के बहुमत का प्रतिनिधित्व करती है तो यही पर्याप्त है। मुसलमान यह तर्क दे सकते हैं। कि इस मामले में यह बात कांग्रेस व लीग के विवाद पर लागू होनी चाहिए। लीग भले ही संपूर्ण मुसलमानों का प्रतिनिधित्व न करे, परंतु यदि वह उनके बहुमत का प्रतिनिधित्व करती है तो कांग्रेस को हिंदू-मुस्लिम सवाल पर