324 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
से था कि वह एक सामान्य मुसलमान थे और उनके अंदर किसी भी किस्म की रूढि़वादी धर्मांधता की आग नहीं जल रही थी। परंतु खिलाफत कांफ्रेंस का सदस्य न बनने का मुख्य कारण यह भी था कि वे भारत से बाहर रहने वाले मुसलमानों के साथ विशेष संबंध कायम करने के खिलाफ थे।
जब कांगे्रस ने असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और विधान सभाओं के बहिष्कार की नीति स्वीकार की तो श्री जिन्ना ने कांगे्रस को छोड़ दिया। वे कांगे्रस के आलोचक तो रहे, लेकिन हिंदुओं की संस्था होने के नाते उन्होंने कभी इसकी आलोचना नहीं की। जब उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उन पर इस प्रकार का आरोप लगाया तो उन्होंने इसका प्रतिकार किया। श्री जिन्ना का टाइम्स ऑफ इंडिया के संपादक को उसी समय का लिखा हुआ एक पत्र है, जो कांगे्रस के प्रति श्री जिन्ना के वर्तमान विचारों को उनके पुराने विचारों के परिपे्रक्ष्य में बिल्कुल साफ कर देता है। यह पत्र इस प्रकार हैः
फ्महोदय, मैं उस वक्तव्य को फिर सही करना चाहूंगा जो मेरे द्वारा दिया
गया बताया जाता है और जिसका आपने बार-बार प्रचार किया है, और
जिसे आपके संवाददाता ‘बेकर’ द्वारा दिनांक एक अक्तूबर को दूसरे कॉलम
में पुनः दोहराया गया है - कि मैंने कांगे्रस को हिंदुओं की संस्था कहकर
कांगे्रस की बदनामी की है। ज्यों ही मेरे भाषण की गलत रिपोर्ट आपके
समाचारपत्र में प्रकाशित हुई, मैंने तुरंत सार्वजनिक तौर पर उसका सुधार
किया, परंतु उसे आपने अपने अखबार में नहीं छापा। अतः मैं एक बार पुनः
आपसे अनुरोध करूंगा कि मेरे इस पत्र को अपने समाचारपत्र में छापकर
अनुगृहीत करें।य् ख्1,
खिलाफत के तूफान के समाप्त हो जाने पर मुसलमानों ने एक बार हिंदुस्तान की आंतरिक राजनीति में हिस्सा लेने की इच्छा जाहिर की और मुस्लिम लीग को फिर से पुनर्जीवित किया गया। श्री रज़ा अली की अध्यक्षता में 3 दिसंबर, 1924 को संपन्न मुस्लिम लीग का अधिवेशन बहुत ही उत्साहवर्धक रहा। इसमें श्री जिन्ना और श्री मुहम्मद अली ख्2,, दोनों ने भाग लिया।
टाइम्स ऑफ इंडिया के 3-10-1925 के अंक में प्रकाशित।
श्री मुहम्मद अली ने काकीनाडा कांगे्रस में संबोधित अपने अध्यक्षीय भाषण में मजाकिए लहजे में कहा
- श्री जिन्ना जल्दी ही हमारे पास वापस आ जाएंगे। (तालियां) मैं कहना चाहूंगा कि एक नास्तिक
काफिर बन जाता है, और एक काफिर नास्तिक बन जाता है। इसी तरह जब श्री जिन्ना कांगे्रस में थे,
तब मैं उनके साथ नहीं था और अब जब मैं कांगे्रस में आया तो वे कांगे्रस से बाहर मुस्लिम लीग में
चले गए। मैं आशान्वित हूं कि एक दिन हमारी सुलह हो जाएगी। (लोगों में हंसी फूट पड़ती है।)