राष्ट्रीय कुंठा
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लीग के इस सत्र में एक संकल्प प्रस्तुत किया गया, जिसमें यह इच्छा जाहिर की गई कि यह उचित ही होगा कि भारत में सभी विचारों और दृष्टिकोणों की मुस्लिम संस्थाओं का एक सम्मेलन दिल्ली या किसी केंद्रीय स्थान पर आयोजित किया जाए, ताकि मुस्लिम समुदाय की आवश्यकताओं के अनुरूप एक संयुत्तQ और व्यावहारिक नीति तैयार की जा सके। इस संकल्प का विवेचन करते हुए श्री जिन्ना ने कहाः
फ्इसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को सुव्यवस्थित करना था। यह इसलिए नहीं
कि वे हिंदुओं से लड़ें बल्कि इसलिए कि आपस में एकत्र होकर मातृभूमि
के लिए सहयोग करें। उन्हें भरोसा था कि यदि वे एक बार संगठित हो
गए तो हिंदू महासभा के साथ-साथ मिलकर दुनिया से कह सकते हैं कि
हिंदू और मुस्लिम दोनों भाई-भाई हैं।य् ख्1,
मुस्लिम लीग ने इसी सत्र में एक दूसरा संकल्प भी पारित किया, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि 33 प्रमुख मुसलमानों के नेतृत्व में एक समिति बनाई जाए, जो मुस्लिम समुदाय की विभिन्न राजनीतिक मांगों का एक मसौदा तैयार करे। संकल्प श्री जिन्ना द्वारा प्रस्तुत किया गया। संकल्प को प्रस्तावित करते हुए उन्होंनेः
फ्इस अभियोग का खंडन किया कि वह मुस्लिम लीग के प्लेटफार्म से
सांप्रदायिक नेता के रूप में खड़े हुए हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि वे
हमेशा की तरह एक राष्ट्रवादी हैं। व्यक्तिगत रूप से उन्हें कोई झिझक
नहीं थी। वे चाहते थे कि उनमें से दो काबिल व्यक्ति विधान मंडल में
उनका प्रतिनिधित्व करें। (हर्षध्वनि) परंतु दुर्भाग्य से उनके मुस्लिम सहयोगी
उनके साथ इस हद तक जाने के लिए तैयार नहीं थे और वे परिस्थितियों
से अनभिज्ञ नहीं थे। वास्तविकता यह थी कि बहुत अधिक संख्या में
मुसलमान विधान मंडल और सेवाओं में पृथक प्रतिनिधित्व चाहते थे। वे
सांप्रदायिक एकता की बात करते थे, परंतु वह थी कहां? यह उपयुक्त
समझौता करके ही संभव था। उन्होंने भारी हर्ष और उल्लास के बीच कहा
कि उनके सहधर्मी स्वराज के लिए संघर्ष करने को तैयार हैं, परंतु वे कुछ
सुरक्षा उपाय चाहते थे। उनका जो भी विचार रहा हो, वह जानते थे कि
एक व्यावहारिक राजनेता के नाते उन्हें वस्तुस्थिति का जायजा लेना बहुत
जरूरी था। एकता के रास्ते में वास्तविक अवरोध दोनों समुदाय नहीं थे,
बल्कि उनमें से दोनों ओर के शरारती तत्व थे।य् ख्2,
दिनांक 1-1-1925, टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित।
इंडियन क्वार्टरली रजिस्टर, 1924, भाग-2, पृ. 481