12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 335

326 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

गलतफहमी फैलाने वालों को तीखी से तीखी भाषा में भी टोकने में उन्हें कोई हिचक नहीं हुई। इस तरह की भाषा का उपयोग एक पक्का राष्ट्रवादी ही कर सकता था। लीग के लाहौर सत्र में 24 मई, 1924 को उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहाः

फ्यदि हम अपने लोगों को स्वतंत्र करना चाहते हैं, तो हमें एक हो जाना

चाहिए, किंतु यदि हम नौकरशाही के गुलाम बनकर रहना चाहते हैं, तो

हमें जरूर छोटी-छोटी बातों पर आपस में लड़ते रहना चाहिए। इससे अंगे्रज

हमेशा हमारे निर्णायक बने रहेंगे।य् ख्1,

1925 और 1928 में आयोजित सर्वदलीय सम्मेलन में श्री जिन्ना हिंदू-मुस्लिम समस्या को संयुत्तQ निर्वाचन के आधार पर हल करने को तैयार थे। 1927 में उन्होंने मुस्लिम लीग के प्लेटफार्म से साफ कहाः

फ्मैं पृथक निर्वाचन नहीं चाहता, यद्यपि मैं यह कहूंगा कि अधिकतर मुस्लिम

दृढ़ता और निष्ठापूर्वक यह विश्वास करते हैं कि पृथक निर्वाचन ही एक ऐसा

तरीका हो सकता है, जिससे वे आश्वस्त हो सकते है।य् ख्2,

1928 में श्री जिन्ना ने साइमन कमीशन का बहिष्कार करने में कांगे्रस का साथ दिया और यद्यपि हिंदू और मुसलमान समझौता करने में असफल रहे, ऐसा उन्होंने मुस्लिम लीग के विभाजन की कीमत पर भी किया।

ऐसे समय में जब गोल मेज सम्मेलन का जहाज सांप्रदायिकता की चट्टान से टकराकर टूटने वाला ही था, श्री जिन्ना ने अपने आपको सांप्रदायिक कहे जाने पर रोष व्यक्त किया और कहा कि वे ब्रिटिश सरकार की मध्यस्थता से बाहर साम्प्रदायिक समस्या का निराकरण पसंद करेंगे। 8 अगस्त, 1931 को इलाहाबाद में आयोजित उत्तर प्रदेश के मुसलमानों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए श्री जिन्ना ने कहाः

फ्पहली बात जो मैं आप से कहना चाहूंगा, वह बहुत ही आवश्यक और

महत्वपूर्ण है, और वह है मुसलमानों का एक होना। ईश्वर के लिए कृपया

आपस में चल रही लड़ाइयों को बंद कर दीजिए। मैंने पूरी ताकत से और

अपनी योग्यता के अनुरूप डॉ. अंसारी, टी.ए.के. शेरवानी, मौलाना अबुल

कलाम आज़ाद और डॉ. सैय्यद महमूद से यह आग्रह किया है और आशा

करता हूँ कि शीघ्र ही मुझे यह खबर मिलेगी कि आपसी मतभेदों के

बावजूद, चाहे हमारे विचार कुछ भी क्यों न हों, हम यह जान गए हैं कि

  1. वही, भाग-1, पृ. 658

  2. वही, 1927, भाग-1, पृ. 37