12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 336

राष्ट्रीय कुंठा

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यह समय आपस में लड़ने का नहीं है।

फ्एक दूसरी बात मैं आपसे यह कहना चाहूंगा कि पे्रस का एक वर्ग है और हिंदुओं का एक वर्ग है, जो विभिन्न तरीकों से मेरे खिलाफ गलतफहमियां फैला रहा है। मैं आज सुबह श्री गांधी के भाषण को पढ़ रहा था, जिसमें उन्होंने कहा है कि वह हिंदू और मुसलमान से बराबर मोहब्बत करते हैं। मैं इस बात का दावा यहां नहीं करता हूं, परंतु ईमानदारी और निष्ठा से कहना चाहूंगा कि मैं दोनों समुदायों के बीच उचित बर्ताव चाहता हूं।’’ऽ

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए श्री जिन्ना ने कहाः

फ्सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न, जो मेरे विचार में हिंदू-मुस्लिम समझौतों का है, उसके बारे में मैं यही कह सकता हूं कि मैं ईमानदारी से यह मानता हूं कि पंजाब और बंगाल में हिंदुओं को मुसलमानों का बहुमत स्वीकार कर लेना चाहिए और यदि यह स्वीकार कर लिया गया तो मैं समझता हूं कि निकट भविष्य में हम किसी समझौते पर पहुंच सकते हैं।

फ्दूसरा प्रश्न उठता है पृथक बनाम संयुत्तQ निर्वाचन का। जैसा कि आप में से अधिकांश लोग जानते हैं, कि यदि पंजाब और बंगाल में मुसलमानों का बहुमत मान लिया गया तो मैं संयुत्तQ निर्वाचन के आधार पर समझौता चाहूंगा। (तालियां) परंतु मैं यह भी जानता हूं कि मुसलमानों का एक बहुत बड़ा भाग पृथक निर्वाचन पर अड़ा हुआ है। मेरा मानना है कि पृथक निर्वाचन के आधार पर भी समझौता हो जाए, इस आशा और विश्वास के साथ कि जब हम नया संविधान तैयार करेंगे और हिंदुओं एवं मुसलमानों के बीच आपसी विश्वास, शक और भय की भावना खत्म हो जाएगी और उन्हें स्वतंत्रता मिल जाएगी, तो ऐसा अवसर भी आएगा जब शीघ्र ही पृथक निर्वाचन संभवतः खत्म हो जाएगा।

फ्अतः मैं मुसलमानों में शांति और समझौते के हक में पहले हूं। फिर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच शांति और समझौता चाहता हूं। यह तर्क का समय नहीं है, यह प्रचार का समय नहीं है, यह ऐसा समय नहीं है कि दोनों में से किसी भी समुदाय की भावनाओं में कड़वाहट आए, क्योंकि दुश्मन हम दोनों के दरवाजे पर है। समझौता नहीं हुआ तो मुझे इसमें जरा भी संदेह नहीं है कि ऐसी स्थिति में अंगे्रज ही मध्यस्थता करेंगे और यह

ऽ इंडियन एनअुल रजिस्टर, 1931, भाग-2, पृ. 230-231