328 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
तो विदित ही है कि जो भी मध्यस्थता करेगा, वह शांति और सत्ता अपने पास ही रखेगा। अतः मैं आशा करता हूं कि वे मुझे गलत नहीं कहेंगे। आखिरकार श्री गांधी अपने आप कहते हैं कि वे मुसलमानों को वह सब देने के लिए तैयार हैं, जो मुसलमान चाहते हैं, परंतु मेरा दोष यह है कि मैं हिंदुओं से कहता हूं कि आप मुसलमानों की केवल 14 बातें मान लें। ये निःसंदेह उस कोरे चेक से कम हैं, जो गांधी जी देने को तैयार हैं। मुझे कोरा चेक नहीं चाहिए। आप क्यों नहीं हमारी 14 बातें मान लेते हैं? जब पं. जवाहरलाल नेहरू कहते हैं - हमें कोरा चेक दीजिए। जब सरदार पटेल कहते है - हमें कोरा चेक दीजिए और इस पर हम स्वदेशी पेन से स्वदेशी कागज पर दस्तखत करेंगे, तो वे सांप्रदायिक नहीं कहे जाते, लेकिन मुझे सांप्रदायिक करार दिया जाता है। मैं हिंदुओं से कहता हूं कि किसी के भी खिलाफ दुष्प्रचार मत कीजिए। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि हम अब भी समझौते की स्थिति में आएंगे, ताकि लाखों लोगों को शांति और
खुशहाली दे सकें।
फ्मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि मैंने वह कर दिया है जो गोलमेज सम्मेलन के दौरान कहा था। यह एक खुली किताब है और इसे जो भी पढ़ना चाहता है, वह स्वयं इससे जान सकता है। मैंने केवल एक ही सिद्धांत का पालन किया और वह यह कि जब मैंने बम्बई तट को छोड़ा था तो मैंने अपने मन में यह बात रखी कि मैं अपने लोगों का हित सर्वोपरि रखूंगा। मेरा विश्वास कीजिए, यदि आप कांफ्रेंस की कार्यवाही को देखेंगे, मैं कोई आत्मप्रशंसा नहीं कर रहा हूं, तो पायेंगे कि मैंने अपना कर्तव्य-पालन पूरी तरह से और बड़ी निष्ठा से किया है और मैं कह सकता हूं कि यदि कांगे्रस या गांधी जी इससे ज्यादा हासिल करते हैं जिसके लिए मैं वहाँ लड़ा हूँ, तो मैं उन्हें बधाई दूंगा।
फ्अपनी बात समाप्त करते हुए श्री जिन्ना ने कहा कि उन्हें समझौते पर पहुंचना होगा। हिंदुओं और मुसलमानों को आखिरकार मित्र बनाना ही होगा। उन्होंने मुसलमान भाइयों से आग्रह किया कि ऐसे अवसर पर यदि संभव हो तो मुसलमानों को शीलता, बुद्धिमत्ता और मैत्री दिखानी चाहिए और इस कांफ्रेंस में समस्या का समाधान निकालना चाहिए। इस कांफ्रेंस में जो संकल्प पारित हों, उसमें ये सब बातें निहित होनी चाहिएं।य्ऽ
ऽ इंडियन एनुअल रजिस्टर, 1931, भाग-2, पृ. 230-231