26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
समझौता करने के उद्देश्य से उसके साथ विचार-विमर्श में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। वस्तुतः किसी भी देश की सरकार को यह अधिकार है कि वह दूसरे ऐसे देश की सरकार को मान्यता न दे जहां एक से अधिक पक्ष या संगठन सरकार के दावेदार हों। उसी तरह कांग्रेस भले ही लीग को मान्यता न दे, मगर वह नेशनल मुस्लिम्स अथवा अहरारों या जमीयत-उल-उलेमा में से किसी एक को तो मान्यता दे और दोनों समुदायों के बीच समझौते की शर्तें तय करें। वास्तव में उसे इस बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त कर काम करना चाहिए कि लीग से समझौते अथवा अन्य मुस्लिम दलों से समझौते में से किसे मुसलमानों द्वारा ठुकरा दिए जाने की अधिक आशंका है। कांग्रेस को किसी न किसी से बात करनी ही होगी। किसी से भी बात नहीं करना तो मूर्खतापूर्ण ही नहीं, शरारतपूर्ण भी माना जाएगा। कांग्रेस के इस रवैए से तो मुसलमानों में रोष ही बढ़ेगा और उन्हें विक्षुब्ध करेगा। मुसलमान कांग्रेस के इस रवैए की यह व्याख्या कर सकते हैं कि यह उनके मोर्चे को कमजोर करने और उनमें भ्रम पैदा करने तथा फूट डालने का प्रयास है। दूसरे मुद्दे के बारे में मुसलमानों ने मांग की है कि मंत्रिमंडलों में ऐसे मुस्लिम मंत्रियों को शामिल किया जाए, जिन्हें विधानमंडल के मुसलमान सदस्यों का विश्वास प्राप्त हो। उन्हें आशा थी कि यदि कांग्रेस सत्ता में आई तो वह उनकी इस मांग को मान लेगी, परंतु वे अत्यंत निराश हुए हैं। इस मांग के बारे में कांग्रेस ने वैधानिक मार्ग अपनाया। कांग्रेस ने मुसलमानों को अपने मंत्रिमंडलों में इस शर्त पर शामिल करना स्वीकार किया कि वे पहले अपने दलों से त्यागपत्र देकर कांग्रेस में शामिल हों और कांग्रेस के संकल्प पर हस्ताक्षर करें। इसका मुसलमानों ने तीन आधारों पर विरोध किया।
सर्वप्रथम, मुसलमानों ने इसे विश्वासघात की संज्ञा दी। मुसलमानों का कहना है कि उनकी मांग संविधान की भावना के अनुरूप है। गोलमेज सम्मेलन में इस बात पर सहमति हुई थी कि मंत्रिमंडल में अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएंगे। अल्पसंख्यकों ने इस बात पर जोर दिया कि इस आशय के प्रावधान को कानूनी स्वरूप दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, हिंदू यह चाहते थे कि यह मामला सामान्य सम्मति के अनुसार निपटाया जाए। एक मध्यम मार्ग खोजा गया। इस पर सहमति हुई कि प्रांतों के गवर्नरों को दिए जाने वाले निर्देशों में इस बात का प्रावधान किया जाए और उन पर यह दायित्व सौंपा जाए कि वे सुनिश्चित करें कि मंत्रिमंडलों के गठन में लोकसम्मति का आदर हो। मुसलमानों ने इस बात पर जोर नहीं दिया कि इस प्रावधान को कानूनी रूप दिया जाए, क्योंकि उन्हें हिंदुओं की सद्भावना पर भरोसा था।
इस समझौते को उसी पार्टी ने तोड़ा जिसने मुसलमानों को आश्वासन दिया था कि उनके प्रति उसका रवैया सही ही नहीं, बल्कि संगत व अनुकूल भी होगा।
दूसरी बात यह है कि मुसलमानों ने यह महसूस किया कि कांग्रेस का दृष्टिकोण