12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 340

राष्ट्रीय कुंठा

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स्वतंत्रता की रक्षा उसी तरह करेंगे, जिस तरह गैर-मुस्लिम भारतीय, यहां तक कि आक्रमणकर्ता यदि इस्लाम का अनुयायी हो, तब भी।

फ्दूसरे, हम सिर्फ आजाद भारत में ही विश्वास नहीं करते, बल्कि संयुत्तQ भारत में विश्वास करते हैं। मुसलमानों का भारत, हिंदुओं का भारत, सिखों का भारत या किसी एक समुदाय अथवा दूसरे समुदाय का भारत नहीं, बल्कि सभी का भारत। यह हमारी दृढ़ आस्था है। हम भारत के विभाजन में किसी भी पार्टी, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, के साथ जाने से इंकार करते हैं, सिर्फ इसलिए नहीं कि यह अव्यावहारिक हैं, (और यह बात घृणास्पद ही नहीं, बल्कि आज जो आदर्श गतिविधियां हो रही हैं, उनके लिए मृत्यु का शंखनाद भी है) बल्कि यह भारत की ऐतिहासिक परंपराओं के प्रतिकूल भी है।

फ्भारत अशोक और चंद्रगुप्त के समय में भी एक था और जब राजसत्ता हिंदुओं से मुगलों के हाथ में गई, तब भी एक ही रहा और आगे भी एक रहेगा। तब हमारी चिर-इच्छाओं की पूर्ति होगी और हम स्वतंत्रता के उच्च धरातल पर पहुंचेंगे, जहां सारी रोशनी सिर्फ प्रतिबिंबित रोशनी ही नहीं होगी, बल्कि ऐसी रोशनी होगी जो हमारे ही चेहरों से निकलती हुई दिखाई देगी।

य्विभाजित भारत की परिकल्पना सर मोहम्मद इकबाल ने अभी हाल ही में मुस्लिम लीग के अध्यक्षीय भाषण में प्रतिपादित की और वह भी ऐसे समय में, जबकि मुस्लिम लीग अपने आप में मृतप्रायः हो गई थी, और स्वतंत्र इस्लाम का प्रतिनिधित्व तो वह कतई नही करती। मुझे

खुशी है कि सर मोहम्मद इकबाल ने अपने इस बयान को वापस ले लिया है। किसी भी व्यक्ति को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि सर मोहम्मद इकबाल जो कर रहे हैं, वह भारत के प्रति इस्लाम की घोषणा है। यदि डॉ. सर मोहम्मद इकबाल ने अपने वक्तव्य को वापस नहीं ले लिया होता तो फिर मैं उनके इस वक्तव्य का जोरदार ढंग से, बिना किसी हिचक के, प्रतिकार करता, क्योंकि यह इस्लाम की आत्मा और परंपरागत विकास की धारणा के खिलाफ है, और मै, गर्वपूर्वक यह कहता हूं कि सांप्रदायिकता के आधार पर भारत का विभाजन नहीं होना चाहिए, बल्कि हिंदुओं और मुसलमानों को अविभाजित भारत के अंदर एक बनकर, सहचर के रूप में रहना है और उन्हें अलग-अलग छोटी सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता।