332 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
डॉ. इकबाल की हिंदू भारत और मुस्लिम भारत की संकल्पना की ही तरह
का दुर्भाग्यपूर्ण प्रस्ताव सिख संप्रदाय के कुछ संप्रदायवादियों द्वारा पंजाब के
विभाजन के बारे में दिया गया है।
फ्‘एक स्वतंत्र, संयुक्त भारत जैसी महान विचारधारा, जिसमें सभी
लोग समानता से बिना किसी भेदभाव के कानून का संरक्षण प्राप्त करें,
जो उनके चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा एक सच्चे और विराट जनतांत्रिक तथा
संयुत्तQ निर्वाचन के आधार पर तैयार किया गया हो, और जिसका प्रशासन
बिना किसी भेदभाव के उस कानून का परिपालन करे और अपने काम के
लिए जवाबदेह भी हो_ ऐसा समाज नहीं जो दूरस्थ विदेशी संसद के हाथ
में हो और जिसका संचालन कहीं दूर से हो रहा हो, बल्कि हमारी अपनी
मातृभूमि के प्रतिनिधियों द्वारा तैयार किया गया हो। दरअसल, मेरे मस्तिष्क
में अपने जनतंत्र की जो तस्वीर उभरती है, उसके रंगों का पूरा विवरण
मैं आपको नहीं दे सकता। राष्ट्रवादी मुस्लिम पार्टी के उद्देश्य और लक्ष्यों
का जिक्र न करते हुए मैं अपनी बात समाप्त करना चाहूंगा, क्योंकि आज
संयुक्त या पृथक निर्वाचन की बात इस कदर उठी है कि संभवतः कोई
भी इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता।
फ्ऐसे समय में पृथक निर्वाचन की कोई भी उपयोगिता क्यों न रही
हो, जब कि कृत्रिम जोड़-तोड़ और कुटिलतापूर्ण मतदान से एक प्रांत की
बहुसंख्यक जनता को मतदान-सूची में अल्पसंख्यक और अल्पसंख्यक जनता
को बहुसंख्यक बनाने का षड्यंत्र चल रहा हो, जब सांप्रदायिक भावनाएं
भड़क उठी हों, जब लोगों में विश्वास-अविश्वास का जहर घोला गया हो
और सारा वातावरण ही इससे ग्रसित हो, हम अनुभव करते हैं कि वर्तमान
की ऐसी परिस्थितियों में भारत के भविष्य के हित में पृथक निर्वाचन का
कोई स्थान नहीं है।य्
श्री जिन्ना और श्री बरकत अली के राष्ट्रीयता और पृथक निर्वाचन तथा पाकिस्तान के बारे में ऐसे विचार थे, परंतु इन्हीं समस्याओं पर अब उनके विचार इसके एकदम विपरीत हैं।
अब तक मैंने हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करने की नाकाम कोशिश और मुस्लिम नेताओं में एक नई विचारधारा उभरने की ओर इंगित करने की कोशिश की है। उपरोक्त परिपे्रक्ष्य में एक तीसरी बात भी है, जिसका मैं विवेचन करना चाहूंगा - कि क्या मुस्लिम विचारधारा न्यायसंगत है और क्या उसके पीछे ऐसा औचित्य है जिसे राजनीतिक दार्शनिक स्वीकार कर सकें?
कई हिंदू मानते हैं कि पाकिस्तान का कोई औचित्य नहीं है। यदि हम अपने