12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 342

राष्ट्रीय कुंठा

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आपको पाकिस्तान के सिद्धांत तक सीमित रखें, तो निःसंदेह यह एक अत्यंत दोषपूर्ण दृष्टिकोण होगा। पाकिस्तान के औचित्य का दार्शनिक आधार है समुदाय और राष्ट्र के बीच भेद। प्रथम, इस बात को हाल ही में स्वीकार किया गया है। राजनीतिक दार्शनिक काफी लंबे अरसे से मुख्यतः दो बातों तक ही सीमित रहे है, जो उनके प्रश्नों में निहित हैं, और वह यह कि अल्पसंख्यक लोगों पर बहुसंख्यक लोगों का शासन करने का अधिकार किसी सीमा तक सरकार के लिए विवेकपूर्ण आधार स्वीकार किया जा सकता है और किस सीमा तक सरकार की वैधता शासित की सहमति पर निर्भर कर सकती है। इस बात पर ज़ोर देने वाले भी कि सरकार की वैधता शासित की सहमति पर निर्भर है, अपनी धारणा से संतुष्ट रहते हैं और आगे जानने की कोशिश ही नहीं करते। उन्होंने शोषित वर्ग की विभिन्न श्रेणियों में भेद करने की आवश्यकता नहीं समझी। उन्होंने निःसंदेह प्रत्यक्ष रूप से यह सोचा होगा कि जो शोषित वर्ग में हैं, वे चाहे एक समुदाय के हों या एक राष्ट्र के हों, यह कोई खास गहराई से सोचने की बात नहीं है। परंतु परिस्थितियों ने राजनीतिक दार्शनिक को इस बात में भेद स्वीकार करने को मजबूर कर दिया है। दूसरी बात यह है कि यह भेद बिना अंतर के नहीं किया जा रहा। यह बहुत बड़ा अंतर है और तदनुसार भेद भी मूलभूत है। एक समुदाय और एक राष्ट्र के बीच बहुत मौलिक भिन्नता होती है, यह इस बात से स्पष्ट है कि राजनीतिक दर्शनशास्त्री एक समुदाय को कुछ सीमित राजनीतिक अधिकार देते हैं, जबकि एक राष्ट्र को अपनी सरकार स्थापित करने का अधिकार देते हैं। राजनीतिक दर्शनशास्त्री एक समुदाय को सिद्धांततः केवल बगावत का अधिकार ही देने को तैयार हैं, परंतु एक राष्ट्र को वे विघटन का अधिकार भी देते हैं। अतः दोनों में बहुत गहरे और मौलिक भेद हैं। बगावत का अधिकार सरकार के शासन करने के तरीके में बदलाव तक ही सीमित है, परंतु राज्य को विघटित करने का अधिकार अधिक प्रबल है, और वह राज्य के सदस्यों के एक समुदाय को राज्य से अपमान तथा राज्य के अधिकृत राज्यक्षेत्र से पृथक करने का अधिकार भी है। कई बार आश्चर्य होता है कि इस भेद का आधार

ऽ सिजविक ने इसे उचित ठहराते हुए कहा है कि जिस प्रश्न पर हम विचार कर रहे हैं, वह बड़ा अहम

है। बगावत की बुराई चुपचाप बर्दाश्त कर लेने की बुराई से कम ही है। बगावत से कभी समस्या के

निदान भी हो सकते हैं चाहे विद्रोहियों की ताकत कितनी भी कमजोर क्यों न हो, क्योंकि बहुसंख्यक

लोगों के मन में यह विचार उठ सकता है कि आखिरकार क्यों कुछ लोग किसी बात को लेकर यह

सब कुछ कर रहे हैं? इन्हीं कारणों से, किसी संभावित विवाद को न पनपने देने के प्रयोजन से भी

समझौते का मार्ग चुना जा सकता है। संक्षेप में, विघटन या अव्यवस्था उभरने के भय से उन लोगों

पर एक अंकुश लग सकता है जिनके हाथ में संवैधानिक रूप से प्रजातांत्रिक सरकार की सत्ता निहित

है। अतः मैं यह मानता हूं कि किसी भी शासित समुदाय में बगावत करने का अधिकार होना लाजिमी

है।

µएलिमेंट्स ऑफ पालिटिक्स, 1929, पृ. 646-647