राष्ट्रीय कुंठा
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किसी अंतिम लक्ष्य को लेकर नहीं है। एक राष्ट्र को विघटन करने का अधिकार देना पड़ेगा, क्योंकि वह राष्ट्र सिर्फ शासन के तौर-तरीकों में बदलाव से ही संतुष्ट नहीं होगा। इसका विवाद इस बात को लेकर है कि उसका लक्ष्य क्या है। यदि वह तब तक संतुष्ट नहीं होगा जब तक कि उनके बीच में एक कृत्रिम समझौता खत्म नहीं कर दिया जाता, जो उन्हें जोड़ता है, तो ऐसी हालत में बुद्धिमत्ता और नैतिकता की मांग यह है कि ऐसे बंधनों को तोड़कर उन्हें मुक्त कर देना चाहिए, ताकि वे अपने-अपने मंतव्य की ओर अग्रसर हो सकें।
V
जहां एक ओर यह मानना जरूरी है कि हिंदू-मुस्लिम एकता के सभी प्रयास विफल रहे हैं और मुस्लिम विचारधारा में पूर्ण परिवर्तन हुआ है, वहीं यह जानना भी आवश्यक है कि इन बातों के निश्चित कारण क्या हैं? हिंदू कहते हैं कि अंगे्रज की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति ही इस विफलता और विचारधारा में पूर्ण परिवर्तन का मुख्य कारण है। इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। हिंदुओं ने आयरलैंड के लोगों की तरह हमेशा सरकार के खिलाफ बोलने की राजनीति की एक मानसिकता बना ली है, यहां तक कि अगर मौसम खराब हो गया हो तो इसमें भी सरकार का हाथ है। अब समय आ गया है कि हिंदुओं को अपनी यह मानसिकता छोड़नी होगी, क्योंकि उनके इस दृष्टिकोण में दो अहम मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया है। सर्वप्रथम, पहला मुद्दा इस बात को दरकिनार कर देता है कि अंगे्रजों की फूट डालो और राज करो की नीति, यह मानते हुए भी कि अंगे्रज ऐसा करते हैं, तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक हमारे बीच ऐसे तत्व न हों जो यह विभाजन संभव करा सकें, और यदि यह नीति इतने लंबे समय तक सफल होती रही है तो इसका तात्पर्य यह है कि हमारे बीच में हमारा विभाजन करने वाले तत्व करीब-करीब ऐसे हैं कि उनमें कभी भी सामंजस्य स्थापित नहीं हो सकता और वे क्षणिक नहीं है। दूसरे श्री जिन्ना, जो इस परिवर्तित विचारधारा के प्रतिनिधि हैं, को कोई भी, यहां तक कि उनके प्रबल शत्रु भी, यह नहीं कहेंगे कि वे अंगे्रजों के पिट्ठू हैं। संभव है कि वे अपने मत के दृढ़ आग्रही और आत्मश्लाघी हों, और कुछ सीमा तक अभिमानी भी हो सकते हैं। इसीलिए दूसरे लोगों के तहत वे किसी सामाजिक मुद्दे को लेकर काम नहीं कर सकते। उनके पास बहुत प्रचुर विचार चाहें न हों, लेकिन उन्हें, जैसा कि उनके कुछ आलोचक भी कहते हैं, दूसरे आदमी के विचारों पर निर्भर थोथा व्यक्ति नहीं कह सकते। या हो सकता है, उनकी प्रसिद्धि वास्तविक न होकर काल्पनिक अधिक हो। लेकिन साथ ही संदेह है कि भारत में उनके समान क्या कोई अन्य राजनीतिज्ञ है, जिसे हम सही ढंग से कह सकें कि वह कट्टर ईमानदार व्यक्ति है। जिस किसी को