336 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
भी अंगे्रज सरकार से उनके संबंधों की जानकारी है, वह यह मानेगा कि वे हमेशा अंगे्रजों के प्रतिद्वंद्वी न सही, आलोचक अवश्य रहे हैं, क्योंकि कोई भी उन्हें खरीद नहीं सकता था। उनके लिए यह कहना पड़ेगा कि वे कभी भी मुकद्दर के सिंकदर नहीं रहे। श्री जिन्ना की इस विचारधारा में सैद्धांतिक परिवर्तन को पारंपरिक हिंदू व्याख्या आंकने में विफल रही है।
हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए किए गए प्रयत्नों की विफलता और मुस्लिम विचारधारा में परिवर्तन की दुखद घटनाओं की वास्तविक व्याख्या क्या है?
हिंदू-मुस्लिम एकता की विफलता का मुख्य कारण इस अहसास का न होना है कि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो भिन्नताएं हैं, वे मात्र भिन्नताएं ही नहीं हैं, और उनके बीच मनमुटाव की भावना सिर्फ भौतिक कारणों से ही नहीं है। इस विभिन्नता का स्रोत ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक दुर्भावना है, और राजनीतिक दुर्भावना तो मात्र प्रतिबिंब है। ये सारी बातें असंतोष का दरिया बना लेती हैं, जिसका पोषण उन तमाम बातों से होता है जो बढ़ते-बढ़ते सामान्य धाराओं को आप्लावित करता चला जाता है। दूसरे स्रोत से पानी की कोई भी धारा, चाहे वह कितनी भी पवित्र क्यों न हो, जब स्वयं उसमें आ मिलती है तो उसका रंग बदलने के बजाय वह स्वयं उस जैसी हो जाती है। दुर्भावना का यह अवसाद, जो धारा में जमा हो गया है, अब बहुत पक्का और गहरा बन गया है। जब तक ये दुर्भावनाएं विद्यमान रहती हैं, तब तक हिंदू और मुसलमान के बीच एकता की अपेक्षा करना अस्वाभाविक है।
तुर्की साम्राज्य में ईसाई और मुसलमानों की तरह भारत के हिंदुओं और मुसलमानों के बीच कई लड़ाइयों हो चुकी हैं या वे शत्रु के रूप में एक दूसरे के सामने आ चुके हैं और इस के बाद उनके संबंध विजेता एवं पराजित के बन गए हैं। जिस भी किसी पक्ष की विजय हुई है, उनके बीच एक गहरी खाई के बावजूद जबरन राजनीतिक एकता बनी रही, चाहे वह मुसलमानों के तहत रही हो या फिर अंगे्रजों को किसी और के तहत_ और उनमें बेहतर संबंधों के बजाए, जैसा कि अन्य कई मामलों में होता रहा है, असंतोष बढ़ता गया है। इस खाई को न तो धर्म और न ही सामाजिक संहिता पाट सकी है। ये दोनों धर्म एक-दूसरे के प्रतिकूल हैं और अच्छी सामाजिक व्यवस्था के लिए इनमें जबरन चाहे जो भी सामंजस्य बिठाया गया हो, किंतु आंतरिक सामंजस्य स्थापित नहीं हो पा रहा है। इन दोनों के बीच एक प्राकृतिक विरोध की भावना रही है, जिसे शताब्दियों से खत्म नहीं किया जा सका है। दोनों मतावलंबियों को साथ लाने के लिए अकबर और कबीर जैसे सुधारकों द्वारा किए गए कार्यों के बावजूद इन दोनों के बीच अभी तक ऐसी नैतिक वास्तविकताएं मौजूद हैं कि लगता है कि उन्हें कभी भी सम-स्तर पर नहीं लाया जा सकता। एक हिंदू बिना किसी