12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 346

राष्ट्रीय कुंठा

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सामाजिक विप्लव या झटके के ईसाई धर्म अपना सकता है, लेकिन वही बिना किसी सांप्रदायिक दंगे या बिना किसी हिचकिचाहट के इस्लाम धर्म नहीं अपना सकता। यह इस बात का द्योतक है कि हिंदुओं और मुसलमानों में कितना गहरा प्रतिरोध है, जो उन्हें अलग-अलग करता है।

यदि इस्लाम और हिंदू धर्म मुसलमानों और हिंदुओं को उनके निजी विश्वास के मामले में अलग-अलग करते हैं तो वे उन्हें सामाजिक मेल-मिलाप से भी दूर रखते हैं। यह सर्वविदित है कि हिंदू धर्म मुसलमानों से शादी-ब्याह पर रोक लगाता है। यह संकीर्णता सिर्फ हिंदू धर्म की ही नहीं है, बल्कि इस्लाम भी हिंदू और मुसलमानों के बीच शादी-ब्याह पर प्रतिबंध लगाता है। ऐसी सामाजिक संहिताओं के होते हुए भी इनमें कोई सामाजिक मेलमिलाप नहीं हो सकता। फलस्वरूप न तो उनके दृष्टिकोण और रहन-सहन में एकता हो सकती है और न ही बरसों से चली आ रही उनकी निश्चित मान्यताओं की धारा बदल सकती है।

हिंदू धर्म और इस्लाम में और भी अनेक दोष हैं, जो हिंदुओं और मुसलमानों के घावों को कभी भरने नहीं देते। कहा जा सकता है कि हिंदू धर्म लोगों को बांटता है, जबकि इस्लाम धर्म उन्हें मिलाता है, लेकिन यह अर्द्धसत्य है क्योंकि इस्लाम भी लोगों को उतना ही बांटता है, जितना कि हिंदू धर्म। इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है, जो मुसलमानों और गैर-मुसलमानों के बीच जो भेद यह करता है, वह बिल्कुल मूर्त और स्पष्ट है। इस्लाम का भ्रातृभाव मानवता का भ्रातृत्व नहीं है, मुसलमानों का मुसलमानों से ही भ्रातृत्व है। यह बंधुत्व है, परंतु इसका लाभ अपने ही निकाय के लोगों तक सीमित है और जो इस निकाय से बाहर हैं, उनके लिए इसमें सिर्फ घृणा और शत्रुता ही है। इस्लाम का दूसरा अवगुण यह है कि यह सामाजिक स्वशासन की एक पद्धति है और स्थानीय स्वशासन से मेल नहीं खाता, क्योंकि मुसलमानों की निष्ठा, जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति नहीं होती, बल्कि वह उस धार्मिक विश्वास पर निर्भर करती है, जिसका कि वे एक हिस्सा हैं। एक मुसलमान के लिए इसके विपरीत या उलटे सोचना अत्यंत दुष्कर है। जहां कहीं इस्लाम का शासन है, वहीं उसका अपना विश्वास है। दूसरे शब्दों में, इस्लाम एक सच्चे मुसलमानों को भारत को अपनी मातृभूमि और हिंदुओं को अपना निकट संबंधी मानने की इजाजत नहीं देता। संभवतः यही वजह थी कि मौलाना मुहम्मद अली जैसे एक महान भारतीय परंतु सच्चे मुसलमान ने अपने शरीर को हिंदुस्तान की बजाए येरूसलम में दफनाया जाना अधिक पसंद किया।

मुसलमान नेताओं के इस सैद्धांतिक परिवर्तन को उनके विचारों में हुआ कपटपूर्ण बदलाव नहीं कहा जा सकता। यह परिवर्तन एक नए प्रकाश की ओर,