338 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
उनकी एक नई नियति की ओर इंगित करता है, जिसे उन्होंने नया नाम दिया है - ‘पाकिस्तान’। ऐसा लगता है कि मुसलमानों ने पहली बार अपनी नई नियति की नए ढंग से पूजा करनी शुरू कर दी है, परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। उनकी यह नई अर्चना है, क्योंकि उनके भाग्य का सूरज जो अब तक बदली में छिपा हुआ था, अब सामने आ गया है और पूरी आभा के साथ चमक रहा है। इस नए भाग्य का आकर्षण स्वाभाविक रूप से मुसलमानों को अपनी ओर खींचेगा। यह आकर्षण इतना प्रबल है कि श्री जिन्ना जैसे व्यक्ति को भी इसने पूरी तरह से झकझोर दिया है और इसे वे रोक नहीं पा रहे हैं। उनका यह भाग्य भारत के मानचित्र पर अपने आपको ठोस रूप में आंक चुका है। जो भी इस मानचित्र पर निगाह डालेगा, वह उसे देखे बिना नहीं रह पाएगा। यह एक वास्तविकता है, जिसे लगता है कि जैसे विधाता ने मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र के रूप में बनाया हो। मुसलमानों का यह नया भाग्य न केवल आसानी से मूर्त रूप ले लेने वाला है, बल्कि आकर्षण भी है। और यह बात मुसलमानों में तेजी से स्वीकृति पा रही है, क्योंकि सारे मुसलमानों को एक इस्लामिक राज्य में परिवर्तित करने की बात निहित है, जिससे विभिन्न देशों में फैले मुसलमानों द्वारा उस देश की राष्ट्रीयता अपनाने का खतरा टल जाएगा जिसमें वे रह रहे हैं, और फलतः इस्लाम में भ्रातृत्व की जो भावना ख्1, है, वह विछित्र होने से बच जाएगी। हिंदुस्तान से पाकिस्तान के अलग होने के साथ ईरान, ईराक, अरब, तुर्की, मिस्र आदि मुस्लिम देश अपना एक संघ बना रहे हैं, जो कुस्तुनतुनिया से लाहौर तक बनेगा। एक मुसलमान वास्तव में मूर्ख ही होगा यदि वह अपने इस नए भाग्य का नक्शा देखकर अपने विचार यह सोचकर पूरी तरह से बदल न दे कि मुसलमानों का भारत में क्या स्थान है।
मुसलमानों का लक्ष्य इतना स्पष्ट है कि कई बार यह आश्चर्य होता है कि उन्हें इसे अपनाने में इतना समय क्यों लगा। इस बात के प्रमाण हैं कि कुछ मुसलमानों ने तो अपने इस अंतिम लक्ष्य को 1923 में ही जान लिया था। इस संदर्भ में खान साहब सरदार एम. गुल खान के उस बयान का जिक्र किया जा सकता है, जो उन्होंने उत्तरी-पश्चिमी सीमा प्रांत की समिति के सम्मुख साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया था। इस समिति के अध्यक्ष श्री डेनिस बे्र थे, जिन्हें सरकार ने उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत के निर्णीत जिलों और आदिवासी क्षेत्रों के बीच शासन-विषयक संबंध तथा निर्णीत जिलों को पंजाब में मिला देने की सिफारिश के लिए नियुक्त किया था। समिति के सम्मुख उनके बयान का महत्व समिति के अन्य सदस्यों ने तो नहीं, पर श्री एन. एम. समर्थ
- सर मुहम्मद इकबाल ने मुसलमानों में, जिनमें भारतीय मुसलमान भी शामिल हैं, किसी भी गैर-मुस्लिम
देश की, जिसमें वे रहते हैं, राष्ट्रीयता स्वीकार करने की भर्त्सना की थी।