राष्ट्रीय कुंठा
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ने पहचाना और अपनी अलग अल्पसंख्यक विषयक रिपोर्ट में इस ओर विशेष ध्यान आकृष्ट किया। उनकी रिपोर्ट की निम्नलिखित बातें मुसलमानों के लक्ष्य निर्माण के इतिहासऽ के एक अंधेरे भाग को सामने लाती हैं। समर्थ कहते हैंः
फ्समिति के सामने दूसरा कोई ऐसा साक्षी नहीं था, जो अपने व्यक्तिगत
ज्ञान और अनुभव के आधार पर सिर्फ उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांत और स्वतंत्र
प्रदेश के बारे में ही नहीं, बल्कि बलूचिस्तान, फारस और अफगानिस्तान
आदि के बारे में भी इतने प्रभावशाली ढंग से अपना पक्ष रखने का दावा
कर सकता हो। यह स्मरणीय है कि वह समिति के सम्मुख इस्लामिक
अंजुमन डेरा इस्माइल खान के अध्यक्ष की हैसियत से साक्षी थे। इस साक्षी
(खान साहब सरदार मुहम्मद गुल खान) से मैंने पूछा - ‘मान लीजिए कि
सीमांत प्रांत की सिविल प्रशासनिक सरकार को सिंध सूबे की सरकार की
तरह बनाया जाए, तो ऐसी स्थिति में यह सूबा भी पंजाब का हिस्सा हो
जाएगा, जैसे कि सिंध बम्बई पे्रसीडेंसी का है। इसके बारे में आपको क्या
कहना है? अपने उत्तर में उन्होंने मुझे सीधा सा जवाब दिया - ‘जहां तक
इस्लाम और मुसलमानों का मुस्लिम राष्ट्रमंडल बनाने के विचार का संबंध
है, मैं इसके विरुद्ध हूं।’ उनके इस उत्तर के बाद मैंने उनसे कुछ और प्रश्न
किए, जिनके उन्होंने स्पष्ट और बेझिझक जवाब दिए। उनके जवाब के
संदर्भित हिस्से मैं यहां उद्धृत करना चाहूंगा।
प्रश्नः आपके अंजुमन के पीछे सर्व-इस्लाम का विचार है, जिसका अभिप्राय है
कि इस्लाम राष्ट्रों का एक संघ है और इस तरह इस सूबे को पंजाब से
मिलाने में नुकसान होगा, और यह बात इस विचार के खिलाफ होगी। जो
लोग आपसे सहमत हैं, क्या उनका मुख्य विचार भी यही है, और क्या यह
सही है?
उत्तरः ऐसा ही है, परंतु मैं आगे कुछ और कहना चाहूंगा। उनका विचार है कि
हिंदू-मुसलमान एकता कभी भी वास्तविक नहीं हो पाएगी। वह वास्तविकता
में एक यथार्थ नहीं हो सकेगी। वे यह सोचते हैं कि इस सूबे को अलग
ही रहना चाहिए तथा इस्लामिक और ब्रिटिश राष्ट्रसंघ के बीच कड़ी बनकर
रहना चाहिए। वास्तव में जब मुझसे यह पूछा जाता है कि मेरा विचार क्या
है तो मैं अंजुमन के एक सदस्य के नाते यह कहता हूँ - हम हिंदुओं और
मुसलमानों का विभाजन भले देख लें। दक्षिण की तरफ 23 करोड़ हिंदू और
उत्तर की ओर 8 करोड़ मुसलमान हैं। रासकुमारीऽ से आगरा तक हिंदुओं
ऽ उत्तर-पश्चिमी सीमा जांच-समिति की रिपोर्ट, 1924, पृ. 123-123