राष्ट्रीय कुंठा
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1924 में मुस्लिम लीग के बंबई अधिवेशन में श्री मुहम्मद अली ने मांटेग्यू चेम्सफोर्ड रिफार्म्स को उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रदेश में लागू करने संबंधी संकल्प में यह सुझाव ख्1, दिया कि पाकिस्तान के सीमांत सीमा सूबे के मुसलमानों को यह आत्मनिर्णय का अधिकार होना चाहिए कि वे भारत के साथ रहें अथवा काबुल के साथ। उन्होंने किसी अंगे्रज को भी उद्धृत किया, जिसने कहा था कि कुस्तुनतुनिया से दिल्ली तक एक सीधी रेखा खींची गई तो इससे जाहिर हो जाएगा कि मुसलमानों का गलियारा सहारनपुर तक है। संभवतः श्री मुहम्मद अली को पाकिस्तान की सारी योजना मालूम थी, जो साक्ष्य के दौरान अचानक ही अनजाने में सामने आ गई, जिसका जिक्र श्री समर्थ ने किया है और वह हैः अंततोगत्वा पाकिस्तान का अफगानिस्तान के साथ बंधन।
ऐसा लगता है कि 1924 से 1950 तक की योजना के बारे में मुसलमानों ने कुछ नहीं कहा या किया। संभवतः उन्होंने इस योजना को दबा दिया और विभाजन से परे पारंपरिक रूप से एक राष्ट्र की धारणा के तहत हिंदुओं से अपने सुरक्षा-उपायों पर बातचीत करते रहे। परंतु 1930 में जब गोलमेज सम्मेलन चल रहा था, तब कुछ मुसलमानों ने एक समिति बनाई, जिसका मुख्यालय लंदन में था, और इसका उद्देश्य था - पाकिस्तान की योजना को गोलमेज सम्मेलन में रखना। इस संबंध में समिति ने गोलमेज सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान के बारे में परचे बांटे। फिर भी, किसी ने इस योजना में रुचि नहीं दिखाई और गोलमेज सम्मेलन के सदस्यों ने भी इस पर कुछ नहीं कहा। ख्2,
यह संभव है कि शुरू में मुसलमानों ने सोचा हो कि पाकिस्तान का यह विचार सिर्फ एक सपना है, जो पूरा नहीं हो सकता। यह संभव है कि बाद में जब उन्होंने इस मुद्दे को यह सोचकर नहीं उठाया कि वे ठीक तरह से संगठित नहीं हैं, ताकि हिंदुओं और मुस्लिमों को इस बात के लिए राजी कर सकें। यह कहना मुश्किल है कि मुसलमानों ने गोलमेज सम्मेलन में पाकिस्तान के लिए जोर क्यों नहीं दिया? शायद उन्होंने यह सोचा हो कि यह योजना अंगे्रजों के खिलाफ ख्3, मानी जाएगी क्योंकि
- सन्दर्भ के लिए देखें, 11 मई, 1925 को हिंदू महासभा के कलकत्ता सम्मेलन में लाला लाजपतराय का
अध्यक्षीय भाषण। (इंडियन क्वार्टरली रजिस्टर, 1925, भाग-1, पृ. 379)
- गोलमेज सम्मेलन के एक सदस्य सर मुहम्मद इकबाल ने सम्मेलन के दूसरे अधिवेशन में पाकिस्तान
का नाम लिए बिना पाकिस्तान की योजना का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि भारत में कोई केंद्रीय
सरकार नहीं होनी चाहिए, सभी सूबे स्वायत्त होने चाहिएं और उनका अस्तित्व स्वतंत्र उपनिवेश जैसा
होना चाहिए, जो सीधे लंदन स्थित राज्य सचिव के संपर्क में रहे।
- कहा जाता है कि इस योजना पर उन अंगे्रज अधिकारियों के साथ गुपचुप तरीके से अनौपचारिक बातचीत
चली, जो उसके हक में नहीं थे। हो सकता है कि मुसलमानों ने यह सोचकर कि कहीं इससे अंगे्रज
नाराज न हो जाएं, इस योजना पर बल नहीं दिया।