342 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हिंदुओं के साथ चल रहे 14 सूत्री विवाद के निर्णय के लिए उन्हें अंगे्रजों पर ही निर्भर रहना है। अच्छे राजनीतिज्ञ होने के नाते वे भली-भांति समझते थे, जैसा कि बिस्मार्क ने भी कहा है, कि राजनीति में सब कुछ संभव है, इसलिए मुसलमानों ने यह सोचकर इंतजार करना बेहतर समझा कि जब तक अंगे्रज 14 सूत्री कार्यक्रम के बारे में साधिकार निर्णय न दे दें, तब तक वे मुंह नहीं खोलेंगे।
पाकिस्तान की इस योजना को सामने रखने में देरी का एक और स्पष्टीकरण है। काफी हद तक यह भी संभव है कि मुस्लिम नेता अभी हाल तक पाकिस्तान बनाने के दार्शनिक औचित्य को नहीं समझ रहे थे। आखिर भारत की राजनीतिक शतरंज में पाकिस्तान प्रस्ताव कोई छोटी चाल नहीं थी। यह अब तक की पहलों में सबसे बड़ी पहल है, क्योंकि इसमें राज्य का विघटन निहित है। कोई भी मुस्लिम यदि उसने इस संबंध में अपने विचार रखने की कोशिश की होती, तो उससे यही पूछा जाता कि इतनी खतरनाक योजना के नैतिक और दार्शनिक आधार क्या हैं? वे इतने दिनों तक पाकिस्तान के दार्शनिक औचित्य को क्यों नहीं खोज पाए, यह भी जानने योग्य है। अतः मुस्लिम नेता भारत के मुसलमानों को एक समुदाय अथवा अल्पसंख्यक वर्ग कहने लगे थे। उन्होंने कभी भी मुसलमानों को एक राष्ट्र नहीं समझा। एक समुदाय और राष्ट्र के बीच बहुत क्षीण अंतर है और यदि वह क्षीण न भी हो, तो भी हर परिस्थिति में दृष्टव्य नहीं है। परंतु राज्य काफी हद तक मिली-जुली आबादियों वाला होता है जिनकी भिन्न-भिन्न भाषाएं, धार्मिक आचरण और सामाजिक परंपराएं होती हैं, और ये आबादियां असंगठित झुंडों का समूह बना कर रहती हैं। किसी भी राज्य का एकजुट समाज नहीं होता, जो एक ही विचार और एक ही काम की धारणा से ओतप्रोत हो। ऐसी स्थिति में एक वर्ग अपने आपको गलती से ही समुदाय कहेगा चाहे वास्तव में उसमें राष्ट्र के तत्व हों। दूसरे, जैसा कि पहले बताया जा चुका है, हो सकता है कि एक जगह के लोगों में एक राष्ट्रीय चेतना न हो, परंतु उनमें वे सारे तत्व विद्यमान हों, जो एक राष्ट्र का निर्माण करने के लिए आवश्यक होते हैं।
फिर, अल्पसंख्यकों के अधिकार और सुरक्षा-उपायों के दृष्टिकोण से यह भेद महत्वहीन है। एक अल्पसंख्यक के लिए चाहे वह एक समुदाय हो या एक राष्ट्र, एक छोटे राष्ट्र के रूप में सुरक्षा के उपायों और एक अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में सुरक्षा के उपायों में बहुत अधिक भिन्नता नहीं हो सकती। ये सुरक्षा-उपाय बहुसंख्यक लोगों के आतंक से बचने के लिए मांगे जाते हैं। यदि अल्पसंख्यक समुदाय पर बहुसंख्यक समुदाय के आतंक की संभावना एक बार स्थापित हो गई, तो यह महत्वहीन हो जाता है कि अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में सुरक्षा-उपाय चाहने वाला एक समुदाय है या एक राष्ट्र है। ऐसा नहीं है कि समुदाय और राष्ट्र में कोई भेद नहीं है। वास्तव में ये