राष्ट्रीय कुंठा
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भेद बहुत ही विस्तृत हैं। संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि एक समुदाय दूसरे समुदाय से चाहे कितना ही भिन्न क्यों न हो, जहां तक अंतिम नियति का सवाल है वह अभी के साथ एक है। दूसरी ओर, एक राष्ट्र अपने राज्य के भिन्न-भिन्न संघटकों से भिन्न ही नहीं होता, बल्कि एक ऐसी नियति में विश्वास करता है जो उस नियति के नितांत विरुद्ध होती है, जिसकी कि राष्ट्र के अन्य अवयव अपेक्षा करते हैं। यह अंतर मुझे इतना गहरा लगता है कि मैं इस आधार पर एक समुदाय या एक राष्ट्र में भेद करने में संकोच नहीं करूंगा। वे लोग, जो भिन्नता के बावजूद अपने तथा अपने विरोधियों के लिए एक ही प्रकार की नियति स्वीकार करते हैं, एक समुदाय हैं। वे लोग जो दूसरों से भिन्न होने के बावजूद भी उसी नियति को स्वीकार करने से इंकार करते हैं जो दूसरों के लिए हैं, तो वे एक राष्ट्र हैं। एक सामान्य नियति को स्वीकार करने या न करने का तत्व ही इस बात को दर्शाता है कि जहां तक हिंदुओं का सवाल है, अछूत, ईसाई और पारसी आदि तो समुदाय हैं, मुसलमान एक राष्ट्र हैं। अतः राजनीतिक गठबंधन में सौहार्दपूर्ण दृष्टिकोण से मुख्य बात यह है कि इन लोगों की अंतिम नियति क्या है? इस भिन्नता के गतिशील चरित्र से इंकार नहीं किया जा सकता। यदि इस अंतिम नियति में फिर भी भिन्नता रहती है तो इसका प्रभाव राज्य के विघटन पर होना लाजिमी है, परंतु जहां तक सुरक्षा-उपायों का सवाल है, तो एक समुदाय और राष्ट्र में भिन्नता नहीं हो सकती। एक समुदाय सुरक्षा-उपायों के उन्हीं अधिकारों और मांगों के योग्य हैं, जो एक राष्ट्र को चाहिए।
पाकिस्तान के लिए दार्शनिक औचित्य खोजने में देरी होने का मुख्य कारण यह है कि मुस्लिम नेता अपने आपको एक समुदाय या एक अल्पसंख्यक के रूप में मानने के अभ्यस्त हो चुके थे। इस परिभाषित शब्दावली का उपयोग उन्हें एक गलत दिशा में ले गया और उन्हें एक अंधे मोड़ पर ला खड़ा किया। जैसे ही उन्होंने अपने आपको एक अल्पसंख्यक समुदाय माना, तो उन्हें ऐसा लगा कि उनके लिए इन सुरक्षा-उपायों की मांग के सिवा और कोई रास्ता नहीं था और इस चीज के लिए वे आधी शताब्दी तक प्रयासरत रहे। यदि उनके मन में यह विचार आया होता तो उन्हें अपने आपको अल्पसंख्यक मानकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए था, बल्कि स्वयं को एक अलग समुदाय मानकर चलने से शायद उन्हें पाकिस्तान के लिए दार्शनिक औचित्य मिल गया होता। ऐसी स्थिति में इस बात की संभावना थी कि पाकिस्तान बहुत पहले बन गया होता।
चाहे जो हो, तथ्य यह है कि मुसलमानों में पूर्ण परिवर्तन हुआ है, और यह भय या आपराधिक प्रलोभन से नहीं, बल्कि उन्हें उनके अंतिम लक्ष्य और सत्य के अहसास के बाद हुआ है। कुछ लोगों को उनके इस अचानक परिवर्तन से धक्का लग