344 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
सकता है, परंतु जिन लोगों ने पिछले 20 वर्षों में हिंदू-मुस्लिम राजनीति का अध्ययन किया है, वे यह मानेंगे कि यह परिवर्तन या इन दोनों समुदायों का एक-दूसरे से दूर हो जाना अवश्यभावी था, क्योंकि हिंदू-मुस्लिम राजनीति में दुखद और अनिष्टकारी घटनाएं हुई हैं। हिंदू और मुस्लिम दोनों समानांतर रास्ते पर चलते रहे हैं। निःसंदेह दोनों उसी दिशा में बढ़े, परंतु वे कभी भी एक रास्ते पर नहीं चले। 1885 में हिंदुओं ने अंगे्रजों के खिलाफ भारतीयों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए कांगे्रस का सूत्रपात किया। मुसलमानों ने हिंदुओं के प्रलोभन में आने से इंकार कर दिया और कांगे्रस के सदस्य नहीं बने। 1885 से 1906 तक मुसलमानों ने अपने आपको हिंदू राजनीति से अलग रखा। 1906 में उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लिए राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की आवश्यकता महसूस की। परंतु तब भी उन्होंने मुस्लिम राजनीतिक गतिविधियों के लिए अलग ही मार्ग अपनाया। जब से मुस्लिम लीग का गठन हुआ, तब से मुस्लिम राजनीति की धारा अलग ही रही और कुछ अपवादों को छोड़कर दोनों ने अलग-अलग काम किया। उनकी धाराएं अलग-अलग दिशाओं में ही बही हैं। उनके लक्ष्य और उद्देश्य भी हमेशा एक नहीं रहे। यहां तक कि उन्होंने अपने वार्षिक सत्र भी एक स्थान पर नहीं होने दिए, ताकि एक की छाया तक दूसरे पर न पड़े। बात ऐसी नहीं है कि कांगे्रस और मुस्लिम लीग आपस में कभी मिले ही नहीं, बल्कि दोनों मिले, लेकिन मात्र विचार-विमर्श के लिए। किन्तु इसमें भी कुछ ही समय तक सफलता मिली, और अधिकतर असफलता ही हाथ लगी। 1916 में लखनऊ में हुए दूसरे सम्मेलन में तो सफलता मिली, लेकिन 1925 में विफलता हाथ लगी। 1928 में मुस्लिम लीग का एक धड़ा कांगे्रस में मिलने को तैयार था, लेकिन दूसरे धड़े ने इससे इन्कार कर दिया और उसने अंगे्रजों पर निर्भर रहना बेहतर समझा। बात यह है कि वे मिले जरूर, लेकिन जुड़े नहीं। सिर्फ खिलाफत आंदोलन के दौरान इन दोनों की धारा एक ही दिशा में बही और यह समझा गया कि अब ये दोनों फिर कभी अलग नहीं होंगे, क्योंकि ईश्वर ने इन दोनों को जोड़ दिया है। परंतु यह आशा मृगतृष्णा बन गई और विफल रही। यह पाया गया कि इन दोनों में कुछ ऐसा है, जिसने उन्हें फिर अलग होने पर मजबूर कर दिया है। इस संगम के कुछ ही बाद, जैसे ही खिलाफत आंदोलन खत्म हुआ, ये दोंनों आपस में एक दूसरे से टकराने लगे, जैसे कि शरीर में कोई बाहरी चीज आ गई हो। ये एक-दूसरे को बाहर निकालने पर उतारू हो गए। नतीजा यह हुआ कि जब ये दोनों अलग हुए तो इतने वेग (और हिंसा) से अलग हुए कि उसकी उपमा सिर्फ पानी से ही दी जा सकती है। इसके बाद ये दोनों अलग-अलग धाराओं में एक-दूसरे से और अधिक दूर और अधिक वेग से बहने लगे। वास्तव में जिस वेग और हिंसा से ये दोनों धाराएं एक-दूसरे से अलग हुई हैं उससे उन्होंने अपनी दिशा बदल दी है। एक समय इनकी