12. राष्ट्रीय कुंठा - Page 354

राष्ट्रीय कुंठा

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दिशा समानांतर थी, लेकिन अब वे एक-दूसरे की विरोधी भी हो गई हैं। एक तो पहले की तरह पूरब की ओर बह रही है और दूसरी विरोधी दिशा में पश्चिम की ओर। इस उपमा को छोड़कर मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि हिंदू-मुस्लिम राजनीति का यह इतिहास गलत नहीं है। यदि इस बात को ध्यान में रखा जाए तो साफ हो जाएगा कि मुसलमानों में यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। यदि यह परिवर्तन एक क्रांति है, तो हिंदू-मुस्लिम समानांतर राजनीति का दौर इस क्रांति की बुनियाद है। यह आधुनिक भारत के इतिहास का विचित्र तथ्य है कि मुस्लिम राजनीति, हिंदू राजनीति के समानांतर चली और उससे कभी नहीं जुड़ी। मुसलमान अपने आपको इस तरह से अलग रखने में एक अज्ञात भावना से प्रभावित हुए, जिसके स्रोत को वे भी नहीं समझ पाए और वे उसी अज्ञात भावना के चलते हिंदुओं से हमेशा दूरी बनाए रहे। यह अज्ञात भावना और कुछ नहीं, बल्कि उनका पूर्व निर्धारित लक्ष्य था, जिसका सांकेतिक रूप था - पाकिस्तान। हालांकि इन्हें पहले इसकी अनुभूति नहीं थी, लेकिन उनमें हमेशा से कहीं न कहीं यह भावना विद्यमान थी। इस परिपे्रक्ष्य में, पाकिस्तान के विचार को नया या एकाएक उत्पन्न हुआ नहीं कहा जा सकता। केवल यही एक बात है जो अब तक साफ नहीं थी, जिसका अब तक कोई नाम नहीं था, उसे अब नाम मिल गया है और अब वह स्पष्ट दिख रही है।

VI

इस तमाम चर्चा का सार यही है कि संपूर्ण भारत, स्वतंत्र भारत या फिर एक उपनिवेश के रूप में भी भारत, असंगत लगता है। इस दृष्टिकोण से कि भारत अटूट रहे, उसके स्वतंत्र भविष्य की आशाओं पर निराशा छा गई है। स्वतंत्र राष्ट्र के लक्ष्य को देखते हुए निराशा ही नजर आती है, क्योंकि हिंदू उस रास्ते का अनुसरण नहीं करेंगे और उनके इस रास्ते के अनुकरण न करने के कारण भी मौजूद हैं। उन्हें डर है कि ऐसा करने से हिंदुओं पर मुसलमानों का शासन हो जाएगा। उन्हें लगता है कि मुसलमानों की आजादी की चेष्टा कोई अबोध बात नहीं है, क्योंकि इसका प्रयोग वे हिंदुओं को ब्रिटिश साम्राज्य सुरक्षा-कवच से बाहर रखकर करना चाहते हैं, ताकि वे पड़ोसी मुस्लिम राज्यों से मैत्री स्थापित करके हिंदुओं को अपने अधीन कर लें। मुसलमानों के लिए आजादी मात्र अंतिम बात नहीं है। यह तो केवल मुस्लिम राज्य स्थापित करने का साधन है। यदि राष्ट्र का लक्ष्य डोमीनियन स्टेटस तक सीमित रखा जाए तो उसमें भी निराशा ही नजर आती है, क्योंकि मुसलमान इससे सहमत नहीं होंगे। उन्हें भय है कि यह दर्जा प्राप्त करके हिंदू ‘एक व्यक्ति एक वोट’ के सिद्धांत के आधार पर हिंदू राज्य स्थापित कर लेंगे। चाहे वे मुसलमानों को कितना ही महत्व क्यों न दें, अंततः वे हिंदुओं के लिए, हिंदुओं द्वारा, हिंदुओं की सरकार ही स्थापित