346 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
करेंगे। यदि भारत को अटूट व संपूर्ण भारत बनाने पर जोर दिया गया, तो भारत के भविष्य के बारे में निराशा ही नजर आती है।
यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या एक अटूट भारत का आदर्श संघर्ष के योग्य है। पहली बात यह है कि यदि भारत अटूट रहता है, तब भी यह संपूर्ण भारत नहीं रहेगा। नाम से भारत भले ही एक देश के रूप में जाना जाता रहे, लेकिन वास्तव में वह दो देशों - हिंदुस्तान और पाकिस्तान, जिनको जबरन और कृत्रिम रूप से जोड़ा गया है - में ही बंटा रहेगा। दो राष्ट्र के सिद्धांत की बलवती विचारधारा के तहत यह ऐसा ही रहेगा। यह सब देखते हुए, तथ्य और वास्तविकता के संसार में, भारत की एकता के विचार का कोई स्थान नहीं है। आम भारतीय के लिए, चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान, जिसका दृष्टिकोण संकीर्णता की घाटी में घिरा हुआ है, इसमें कोई आकर्षण नहीं रह गया है परंतु इस बात ने दोनों समुदायों की कल्पना और उनके सामाजिक चिंतन को बहुत प्रभावित किया है। दो राष्ट्र का यह सिद्धांत क्षणिक भावनात्मक एकता की इच्छा को भी पनपने नहीं देगा। अंतर्द्वंद्व का यह कीटाणु हमारी राजनीति में ऐसी मनःस्थिति पैदा करेगा कि उससे इस जबरन बनाई गई एकता को समाप्त करने हेतु लोगों के मन में जीवन और मरण की सीमा तक के संघर्ष की भावना उत्पन्न होगी। यदि किसी प्रभावशाली शक्ति के कारण यह एकता भंग नहीं भी होती है, तो भारत का भाग्य यही होगा कि जबरदस्ती बनाई गई एकता उसकी सारी शक्ति को पी जाएगी, उसे एकदम कमजोर कर देगी या उसके गठन को एकदम ढीला कर देगी, लोगों के आपसी पे्रम और विश्वास को कमजोर कर देगी और उसके विकास की गति को यदि पीछे न भी कर पाए, तब भी यह निश्चित है कि वह उसके भौतिक और नैतिक संसाधनों के उपयोग को रोक देगी। ऐसी हालत में भारत एक रूग्ण और रक्तविहीन शव जैसा रह जाएगा, जो मृत्यु को प्राप्त हो गया है, किंतु दफनाया नहीं गया है।
जबरन एकता का दूसरा नुकसान यह होगा कि हिंदू-मुस्लिम समस्या को निपटाने के लिए आधार खोजने होंगे। इस समस्या का निदान करना कितना दुष्कर होगा, यह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। भारत को हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बांटने के अलावा और क्या किया जा सकता है? देश के अन्य हितों को नुकसान पहुंचाए बिना इस समस्या के निपटान के लिए जो कुछ भी किया जा सकता है, इससे ज्यादा सोचना मुश्किल है। इस बात में संदेह नहीं कि जब तक यह जबरन एकता बनी रहेगी जब तक भारत में सांप्रदायिकता का निदान नहीं होगा, तब तक भारत कोई राजनीतिक प्रगति नहीं कर सकेगा। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच, जिन्हें अब हमें दो अलग-अलग राष्ट्र मानना होगा, इस बारे में एक सांप्रदायिक समझौता, बल्कि