राष्ट्रीय कुंठा
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जिसके तहत वह अपनी स्थिति को कायम रख सकता है। झूठा दुष्प्रचार, तथ्यों को गलत ढंग से पेश करना, पद या स्वर्ण का लालच देना, उस समुदाय को शक्तिविहीन क्षीण कर देना तथा उसे अप्रभावी और गुलाम बना देना है। एकता स्थापित करने का यह एक मार्ग हो सकता है, परंतु यह निंदनीय है, क्योंकि यह विपक्ष को झूठे और गलत माध्यम से कुचलने वाला है। इससे कोई एकता स्थापित नहीं होती, बल्कि सिर्फ उत्तेजना, कड़वाहट और शत्रुता ही पैदा होती है।ऽ कांगे्रस के जनसंपर्क-अभियान ने बिल्कुल यही किया, क्योंकि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि जनसंपर्क-अभियान की यह योजना पाकिस्तान के प्रादुर्भाव को प्रस्फुटित करने में सहायक हुई।
यह कहा जा सकता है कि जनसंपर्क-अभियान का एक राजनीतिक उत्तेजक के रूप में चलाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण था, और बेहतर होता यदि उसका उपयोग सामाजिक एकता कायम करने के लिए ज्यादा सफलतापूर्वक किया जाता। पर क्या यह हिंदुओं और मुसलमानों के बीच उस सामाजिक दीवार को तोड़ने में सफल होता जो उन्हें विभाजित करती है? यह हर भारतीय के लिए बड़े क्षोभ की बात है कि इन दोनों समुदायों के बीच ऐसा कोई सामाजिक बंधन नहीं है जो उन्हे परस्पर निकट लाए। इनके बीच एक साथ खान-पान नहीं हैं और न ही अंतर्विवाह आदि के संबंध हैं। क्या ये बातें इनके बीच स्थापित की जा सकती हैं? उनके उत्सव अलग-अलग हैं। क्या हिंदुओं और मुसलमानों को परस्पर पर्वों में शामिल होने के लिए पे्ररित किया जा सकता है? उनके धार्मिक आचार-विचार भिन्न ही नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के खिलाफ भी हैं। इनकी संस्कृतियां अलग-अलग हैं। साहित्य एवं इतिहास अलग-अलग हैं। वे भिन्न ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति अरुचि और घृणा पैदा करने वाले हैं। क्या कोई उन्हें जीवन के एक ही शाश्वत झरने से पानी पीने के लिए विवश कर सकता है? उनके बीच मेलमिलाप के कोई समान आधार नहीं हैं और न ही ऐसा कोई
ऽ श्री अब्दुल रहीम जैसे सौम्य व्यक्ति ने मुस्लिम लीग के 30 दिसम्बर, 1925 को अलीगढ़ में आयोजित
सम्मेलन के अध्यक्षीय भाषण में हिंदुओं की चाल से पैदा कड़वाहट का उल्लेख करते हुए शुद्धि, संगठन
और हिंदू महासभा तथा लाला लाजपतराय और स्वामी श्रद्धानंद जैसे राजनीतिज्ञों द्वारा किए गए आक्रमण
की भर्त्सना की और कहा, फ्कुछ हिंदू नेताओं ने खुलकर कहा है कि मुसलमानों को भारत से खदेड़
देना चाहिए, जैसे कि स्पेन के लोगों ने स्पेन के ‘मूरों’ को स्पेन से खदेड़ दिया था। अपने हिंदू दोस्तों
के निगलने के लिए यह बहुत बड़ा कौर होगा। मुसलमान उन कृत्रिम परिस्थितियों के शिकार हैं, जिनमें
उन्हें रहना पड़ता है और उन्हें यह मानना पड़ा कि हिंदू लाभदायक स्थिति में हैं, यहां तक कि अंगे्रजों
ने भी उनके विषाक्त दुष्प्रचार से डरना सीख लिया था। हिंदुओं ने मुसलमानों को छोटा रखने की कला
शानदार ढंग से हासिल कर ली थी और उन्होंने उन्हीं मुसलमानों को छोड़ा जो हिंदू राजनीति में विश्वास
करने लगे थे। वास्तव में हिंदुओं ने अपने उकसाने वाले और आक्रामक व्यवहार से मुसलमानों पर स्पष्ट
कर दिया था कि ये अपने भाग्य को उनके भरोसे नहीं छोड़ सकते, और मुसलमानों को आत्मरक्षा के
लिए हर संभव उपाय करने होंगे।य् ऑल इंडिया रजिस्टर, 1925, भाग-2, पृ. 356