क्या पाकिस्तान बनना चाहिए 355
एक लंबी कहानी है, जिसमें जन-धन की हानि शर्मनाक सीमा तक पहुंच गई थी। सांप्रदायिक स्थिति इतनी भयंकर कभी नहीं थी जितनी 15 वर्ष पूर्व भारत सरकार अधिनियम, 1935 के पारित होने के पहले थी। फिर भी इस पारस्परिक तनाव के फलस्वरूप हिंदू और मुसलमानों में एक देश में एक संविधान के अंतर्गत रहने की इच्छा में कोई व्यवधान पैदा नहीं हुआ। फिर सांप्रदायिक तनाव के विषय में अब इतनी अधिक चर्चा क्यों की जाती है?
क्या भारत ही ऐसा देश है, जहां सांप्रदायिक तनातनी है? कनाडा के विषय में क्या विचार है? कनाडा में अंगे्रजों और फ्रेंचों के संबंधों को लेकर मि. एलेक्जेंडर बे्रडीऽ का कथन विचारणीय है -
फ्चार मूल प्रांतों में से तीन-नोवा स्कोशिया, न्यू बुसविक और ऑटेरियो-में
उसी एंग्लो-सैक्सन समुदाय और परंपराओं को मानने वाले लोगों की संख्या
अधिक थी। प्रारंभ में अमरीकी क्रांति के फलस्वरूप इन कालोनियों को
उन 50,000 यूनाइटेड एंपायर राष्ट्रभक्तों ने बसाया, जिन्होंने उत्पीड़न के
कारण उत्तर की कठिन यात्रा की और निर्जन प्रदेश में अपने घर बसाए।
अमरीकी क्रांति से पहले नोवा स्कोशिया में काफी स्काटलेंडवासी और
अमरीकी बसे हुए थे और क्रांति के बाद सभी राष्ट्रभक्त कालोनियों में गे्रट
ब्रिटेन और आयलैंड से आए आप्रवासी भी इन बस्तियों में बसाए गये।
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क्यूबेक प्रांत इनसे काफी भिन्न था। 1867 में फ्रेंच कनाडा अपने
आप में एक सांस्कृतिक इकाई थी जिसे जाति, भाषा और धर्म के रोड़ों के
कारण ब्रिटिश समुदाय से तिरस्कृत कर दिया गया था। ये लोग कैथोलिक
विचारों से प्रभावित और दकियानूसी किस्म के थे, जिनका प्यूरिटिनिज़्म
और प्रोटेस्टेंस धर्मियों, विशेषकर कालविनिस्ट से कोई लगाव नहीं था।
दोनों समुदायों के धार्मिक विश्वास वास्तव में एकदम विपरीत थे। यदि
धार्मिक कार्यों में हमेशा ऐसा न भी हो तो भी सामाजिक रूप में अंगे्रजी
प्रोटेस्टेनिज़्म का झुकाव हमेशा लोकतंत्र, यथार्थ और आधुनिकता की ओर
रहा तथा फ्रांस के केथोलिज़्म का झुकाव परंपरावादिता, आदर्शवादिता और
अतीत के मनन की ओर रहा।
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ऽ कनाडा, अध्याय-1