13. क्या पाकिस्तान बनना चाहिए? - Page 369

360 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

पड़ गए हों, कोई भेद है और कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति जिसकी उपेक्षा नहीं कर सकता। जब एक समाज छिन्न-भिन्न हो रहा हो और दो राष्ट्र का सिद्धांत समाज और देश के विभाजन का स्पष्ट सूचक हो, तो कार्लाइल के ‘ऑरगेनिक फिलामेंट्स’ - अर्थात् वे प्रबल शक्तियां जो इन भागों को एक सूत्र में बांधने के लिए सक्षम हों जो छिन्न-भिन्न हो चुकी हैं - उनका कोई अस्तित्व नहीं है ऐसे मामलों में विघटन की भावना खेदजनक ही समझी जा सकती है। यह रोकी नहीं जा सकती। परन्तु जहां उक्त शक्तियों का अस्तित्व है, उनके ऊपर ध्यान न देना और मुसलमानों की भांति समाज तथा देश को जान-बूझकर विभाजित करने पर बल देना, एक घोर अपराध है। मुसलमान एक भिन्न राष्ट्र इसलिए नहीं चाहते कि वे भिन्न रहे हैं बल्कि इसलिए कि यह उनकी कामना है। मुसलमानों में बहुत कुछ है जिसके फलस्वरूप, यदि वे चाहें तो अपने को एक राष्ट्र के रूप में ढाल सकते हैं, परंतु क्या ऐसी कोई स्थिति नहीं है जो हिंदू और मुसलमानों में सघन रूप से पाई जाती हो और जिसके फलस्वरूप यदि वह विकसित की जाए तो वह उन दोनों को एक मानव समाज में ढाल सके? इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि उनके अनेक ढंग, तौर-तरीके, धार्मिक तथा सामाजिक रीति-रिवाज समान हैं। इस बात से भी कोई इन्कार नहीं कर सकता कि कुछ ऐसे भी रीति-रिवाज, संस्कार तथा आचरण हैं, जो धर्म पर आधारित हैं और जिनके फलस्वरूप हिंदु और मुसलमान आपस में दो भागों में विभक्त हैं। प्रश्न यह है कि उनमें से किस पर अधिक बल दिया जाए। यदि उन बातों पर बल दिया जाता है, जो दोनों में समान रूप से पाई जाती हैं, तो भारत में दो राष्ट्रों की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। पर यदि उन बातों पर ध्यान दिया जाता है जो सामान्य रूप से भिन्न हैं, तो ऐसी स्थिति में निःसंदेह दो राष्ट्रों का सवाल सही है। यही धारणा श्री जिन्ना की है। भारतीय समाज एकमात्र ऐसा समाज है जो कभी एक नहीं हो सकता। माना कि वे एक राष्ट्र नहीं है बल्कि एक जनसमूह है, तो इससे क्या? यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि मिले हुए व्यक्तियों के रूप में राष्ट्रों के उदय होने से पूर्व वहां मात्र जनसमूह था। इसमें कोई शर्म की बात नहीं है, यदि भारतीय एक जनसमूह के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। इस निराशा का कोई कारण भी समझ में नहीं आता कि भारतीय जनसमूह यदि चाहे तो एक राष्ट्र नहीं हो सकता। डिजराइली के कथनानुसार, राष्ट्र एक कला तथा काल के कार्य का प्रतिफल है। यदि हिंदू और मुसलमान उन बातों पर स्वीकृति प्रदान करने पर बल देते हैं जो उन्हें एक सूत्र में बांधती हैं, और उन बातों को भूल जाते हैं जिनके परिणामस्वरूप वे विभक्त होते हैं तो फिर ऐसा कोई कारण नहीं है कि आगे चलकर उनका एक राष्ट्र के रूप में उदय न हो। हो सकता है कि उनकी राष्ट्रीयता इतनी एकताबद्ध न हो जितनी फ्रांस और जर्मनी की है, परंतु वे मन की एकसमान स्थिति सरलतापूर्वक उत्पन्न कर सकते