13. क्या पाकिस्तान बनना चाहिए? - Page 371

362 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

मुसलमान अपनी राष्ट्रीयता तथा संस्कृति के क्षीण हो जाने को लेकर इतने भयभीत क्यों हैं? यदि मुसलमान विभाजन का आग्रह करते हैं, तो कुटिल व्यक्ति संभवतः यह निष्कर्ष निकालें कि हिंदू और मुसलमानों के बीच इतनी अधिक सामान्यता है कि मुस्लिम नेतृत्व में इतना भय व्याप्त है कि वे यह सोचने लगें कि जब तक विभाजन नहीं होता, मुसलमानों में जो थोड़ी-बहुत अलग इस्लामी संस्कृति बची हुई है, अंततः वह भी हिंदुओं के साथ सामाजिक संपर्क होने के कारण समाप्त हो जाएगी और_ फलस्वरूप दो राष्ट्रों के बावजूद भारत में एक राष्ट्र ही बचा रहेगा। यदि मुस्लिम राष्ट्रीयता इतनी ही क्षीण है तो विभाजन का विचार बनावटी है और पाकिस्तान का मामला अपना आधार खो बैठता है।

VI

क्या पाकिस्तान इसलिए बनना चाहिए कि इसके अभाव में स्वराज एक हिंदू राज होगा? मुस्लिम जनता उक्त प्रलाप में इतनी आसानी से बह जाती है कि इसमें जो निहित भ्रांतियां हैं, उनका पर्दाफाश कर देना परमावश्यक है।

सर्वप्रथम, हिंदू राज के लिए मुस्लिम आपत्ति क्या शुद्ध अंतःकरणीय है, अथवा एक राजनीतिक विरोध है? यदि यह शुद्ध अंतःकरणीय है तो यही कहा जा सकता है कि यह बड़ा विचित्र अंतःकरण है? वास्तव में ऐसे करोड़ों मुसलमान भारत में हैं जो बिना किसी प्रतिबंध तथा नियंत्रण के हिंदू रियासतों में रहते हैं। वहां मुस्लिम लीग अथवा मुसलमानों द्वारा कोई आपत्ति नहीं उठाई गई है। मुसलमानों ने एक समय ब्रिटिश राज के विरुद्ध शुद्ध अंतःकरण से आपत्ति उठाई थी। आज उन्हें मात्र आपत्ति ही नहीं है, अपितु वे उसके प्रबल समर्थक हैं। ब्रिटिश राज के प्रति आपत्ति न होना अथवा हिंदू रियासतों के हिंदू राजाओं के राज के प्रति आपत्ति न होना, किन्तु अंग्रेजों से भारत के लिए स्वराज लेने पर इस आधार पर आपत्ति होना कि ऐसा भारत हिंदू राज होगा, मानो उसमें कोई अंकुश ही नहीं होंगे, ऐसी मनोवृत्ति है जिसका तर्क समझना बहुत कठिन है।

हिंदू राज के विषय में राजनीतिक आपत्तियां अनेक आधारों पर निर्भर करती हैं। पहला आधार यह है कि हिंदू समाज एक लोकतंत्री समाज नहीं है। यह सच नहीं है। चाहे यह पूछना सही न हो कि मुसलमानों ने हिंदू समाज-सुधार के लिए चलाए गए विभिन्न आंदोलनों में कभी भाग लिया है, लेकिन यह पूछना सही होगा कि क्या केवल मुसलमान ही उन बुराइयों से उत्पीडि़त हुए हैं जो हिंदू समाज के अप्रजातांत्रिक होने के फलस्वरूप उत्पन्न हुई हैं? क्या करोड़ों शुद्र और गैर-ब्राह्मण करोड़ों अस्पृश्य हिंदू समाज के इस अलोकतांत्रिक चरित्र के फलस्वरूप सर्वाधिक उत्पीडि़त नहीं हुए हैं? शिक्षा, लोक सेवा और राजनीतिक सुधारों के फलस्वरूप उस हिंदू शासक जाति