क्या पाकिस्तान बनना चाहिए
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को, जो हिंदूओं की उच्च जातियों से निर्मित हुई है और जो समस्त हिंदू जनसंख्या के दस प्रतिशत से अधिक नहीं है, छोड़कर अन्य किसको अधिक लाभ हुआ है? क्या उक्त हिंदू शासक जाति ने, जो हिंदू राजनीति पर अपना नियंत्रण रखती है, अस्पृश्य और शूद्रों के निहित स्वार्थों की सुरक्षा की अपेक्षा मुसलमानों के निहित स्वार्थों की सुरक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया है? क्या श्री गांधी अस्पृश्यों को कोई राजनीतिक लाभ देने का विरोध करते हैं पर क्या मुसलमानों के पक्ष में वे एक कोरे चेक पर हस्ताक्षर करने के लिए तत्पर नहीं हैं? वास्तव में हिंदू शासक जाति अस्पृश्यों तथा शूद्रों के साथ शासन में भाग लेने की अपेक्षा मुसलमानों के साथ शासन में भाग लेने को अधिक तत्पर दिखाई देती है। मुसलमानों के पास निश्चय ही हिंदू समाज के इस अलोकतंत्रात्मक स्वरूप के प्रति शिकायत करने का किंचित भी आधार नहीं है।
दूसरा आधार, जिस पर हिंदू राज के प्रति मुसलमानों की आपत्ति आधारित है, यह है कि हिंदू एक बहुसंख्यक जाति है और मुसलमान अल्पसंख्यक जाति है। यह सत्य है। परंतु क्या भारतवर्ष ही एक ऐसा देश है जहां इस प्रकार की स्थिति है? भारतवर्ष में इस स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन हमें कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और स्विटज़रलैंड की स्थिति से करना चाहिए। सर्वप्रथम जनसंख्या-वितरण को लिया जाए। कनाडा की कुल जनसंख्या 10,376,786 में से मात्र 2,927,990 फ्रेंच ख्1, हैं। दक्षिण अफ्रीका में डचों की जनसंख्या 1,120,770 है और अंगे्रजों की केवल 783,071 है ख्2, । स्विटरज़रलैंड की कुल जनसंख्या 4,066,400 में 2,924,313 जर्मन, 831,097 फ्रेंच और 242,034 इटालियंस हैं ख्3, ।
यह दर्शाता है कि छोटी राष्ट्रीयताओं को बड़ी जाति के राज में रहने पर कोई डर नहीं है। लेकिन ऐसी धारणा का उनमें क्यों अभाव है और इसका क्या कारण है? क्या यह इसलिए है क्योंकि विधान सभा तथा कार्यपालिका में अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने की वहां कोई संभावना नहीं है? बात इसके विपरीत है। दुर्भाग्यवश, ऐसे कोई भी आंकड़े हमारे पास उपलब्ध नहीं हैं, जिनके द्वारा हम स्विटज़रलैंड, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका की विभिन्न एवं अल्प राष्ट्रीयताओं के प्रतिनिधियों की वास्तविक संख्या का अध्ययन कर पाते। भारत की भांति वहां जातिगत स्थानों के बारे में आरक्षण की भावना नहीं है। प्रत्येक जाति को आम चुनाव में यह अधिकार है कि वह जितने चाहे, उतने स्थानों के लिए अपने उम्मीदवार खड़े कर सकती है। परंतु उन स्थानों की सम्भाव्य संख्या की गणना करना आसान है, जिन्हें प्रत्येक राष्ट्र विधान सभा के कुल स्थानों पर अपनी जनसंख्या के अनुपात के आधार पर प्राप्त कर सकता है। इस
कनाडा ईयर बुक, 1936
दक्षिण अफ्रीका ईयर बुक, 1941
स्टेटसमैन्स ईयर बुक, 1941