366 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
जाने पर पार्टी को पुनः एक सीधे मार्ग पर आ जाने में कोई बाधा उपस्थित नहीं हो सकती। इसके लिए हम चाहते हैं कि कांगे्रस और महासभा भंग हो जाएं और हिंदू तथा मुसलमान मिल-जुलकर राजनीतिक पार्टियों का निर्माण कर लें, जिनका आधार आर्थिक जीर्णोद्धार तथा स्वीकृत सामाजिक कार्यक्रम हो, तथा जिसके फलस्वरूप हिंदू राज अथवा मुस्लिम राज का खतरा टल सके। भारत में हिंदू-मुसलमानों की संयुक्त पार्टी की रचना कठिन नहीं है। हिंदू समाज में ऐसी बहुत-सी उपजातियां हैं जिनकी आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक आवश्यकताएं वही हैं जो बहुसंख्यक मुस्लिम जातियों की हैं। अतः वे उन उच्च जाति के हिन्दुओं की अपेक्षा, जिन्होंने शताब्दियों से आम मानव अधिकारों से उन्हें वंचित कर दिया है, अपने व अपने समाज के हितों की उपब्धियों के लिए मुसलमानों से मिलने के लिए शीघ्र तैयार हो जाएंगी। इस प्रकार के मार्ग का अवलंबन एक साहसपूर्ण कार्य नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इस मार्ग का पहले से ही अनुकरण किया गया है। क्या यह एक तथ्य नहीं है कि मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधारों के अंतर्गत अधिकांश प्रांतों में मुसलमान, गैर-ब्राह्मण तथा पिछड़ी जातियां एकता के सूत्र में बंधीं और 1920 से 1937 तक एक टीम की तरह उन सुधारों पर अमल किया गया? इसमें हिंदू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक एकता प्राप्त करने की अत्यधिक उपयोगी पद्धति निहित है और इसके परिणामस्वरूप हिंदू राज का खतरा खत्म हो जाता है। श्री जिन्ना इस रूपरेखा का आसानी से सहारा ले सकते थे और उनके लिए इसमें सफलता प्राप्त करने में कोई कठिनाई भी नहीं थी। वास्तव में श्री जिन्ना ही एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें इस ओर सफलता प्राप्त करने के समस्त अवसर प्राप्त हैं, यदि उनके द्वारा एक संयुक्त, गैर-सांप्रदायिक पार्टी के निर्माण का प्रयत्न किया जाए। उनमें संगठन करने की योग्यता है, वे राष्ट्रीयता के लिए प्रसिद्ध हैं। अनेक हिंदू भी जिनका कांगे्रस से मतभेद है, उनसे सहयोग करने को तत्पर हो जाते, यदि उन्होंने समान सोच वाले हिंदू-मुसलमानों की एक संयुक्त पार्टी बनाने का आह्वान किया होता। सोचिए कि 1937 में श्री जिन्ना ने क्या किया था? श्री जिन्ना ने मुस्लिम राजनीति में प्रवेश किया और आश्चर्यजनक ढंग से मुस्लिम लीग को जो मर रही थी और क्षीण हो रही थी पुनर्जीवित किया, तथा कुछ ही वर्षों पूर्व जिसका दाह-संस्कार देखकर वह प्रसन्न होते। इस तरह सांप्रदायिक राजनीतिक पार्टी का प्रारंभ कितना ही खेदजनक सही, परंतु उसका जो सुखद स्वरूप था, वह था श्री जिन्ना का नेतृत्व। प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव करता था कि श्री जिन्ना के नेतृत्व में लीग कभी भी सांप्रदायिक पार्टी नहीं हो सकेगी। अपने इस नए कार्य के पहले दो वर्षों में लीग ने जो प्रस्ताव पारित किए हैं, उनसे यह पता चलता है कि हिंदुओं और मुसलमानों का एक संयुक्त राजनीतिक दल विकसित हो सकेगा। अक्तूबर 1937 में लखनऊ में संपन्न मुस्लिम लीग के वार्षिक अधिवेशन पर कुल 15 प्रस्ताव पारित हुए। उनमें से