क्या पाकिस्तान बनना चाहिए
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जो भी हो, दो और ऐसे महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनकी चर्चा किए बिना यह विवाद समाप्त नहीं किया जा सकता था। इन प्रश्नों का उद्देश्य मेरे और मेरे आलोचकों के बीच जो भेद है, उसे साफ कर देना है। इन प्रश्नों में, एक तो मैं आलोचकों से पूछने का अधिकारी हूं और दूसरे को आलोचक मुझसे पूछ सकते हैं।
पहला प्रश्न जो मैं आलोचकों से पूछना चाहता हूं, यह है कि इन त्रुटियों के परिपे्रक्ष्य में वे क्या आशा करते हैं? क्या वे यह आशा करते हैं कि यदि इस वाद-विवाद में मुसलमान हार जायें तो वे पाकिस्तान का नाम न लें? यह तो उन शर्तों पर निर्भर करता है जो विवाद को निश्चित करने के लिए अपनाई जाएंगी। हिंदू और मुसलमान उस तरीके पर चल सकते हैं, जिसे प्राचीन काल में ईसाई मिशनरियों ने हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए अपनाया था। इस तरीके के मुताबिक ईसाई मिशनरियों और ब्राह्मणों के बीच बहस का, जिसे जनता सुन भी सके, एक दिन निश्चित कर दिया जाता था। पहली शर्त तो ईसाई धर्म का प्रतिनिधित्व करती थी और दूसरी में हिंदू धर्म की व्याख्या होती थी। तीसरी शर्त यह होती थी कि जो अपने धर्म की पुष्टि में हार जाएगा, वह दूसरे के धर्म को स्वीकार करने को बाध्य होगा। यदि पाकिस्तान के मसले पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच झगड़ा बाध्य होगा। यदि पाकिस्तान के मसले पर हिंदुओं पर मुसलमानों के बीच झगड़ा निपटाने का यह तरीका स्वीकार किया गया होता तो त्रुटियों की इस श्रृंखला का कुछ लाभ हो सकता था। किंतु यह भूलने की आवश्यकता नहीं है कि किसी बहस को समाप्त करने का एक और तरीका है, जिसे ‘जानसनी’ तरीका कहा जा सकता है और जो उस तरीके पर आधारित है जिसे डॉ. जानसन ने पादरी बर्कले से बहस करने में प्रयोग किया था। बास्वेल लिखते हैं कि जब उन्होंने डॉ. जानसन को बताया कि पादरी बर्कले का मत यह कि पदार्थ का कोई अस्तित्व नहीं है और इस संसार में सब कुछ काल्पनिक है, एक कुतर्क है, पर उसका खंडन करना कठिन है, तो डॉ. जानसन ने एक भारी पत्थर पर जोर से पैर पटकते हुए तत्काल उत्तर दिया - ‘मैं इसे इस तरह खंडित करता हूं।’ हो सकता है मुसलमान इस बात पर राजी हो जाएं, जैसा कि अधिकांश मुस्लिम बुद्धिजीवी कहते हैं, कि पाकिस्तान का जो मसला है, उसका फैसला ‘बहस’ और ‘तर्क’ के परीक्षणों से हो। किंतु मुझे आश्चर्य नहीं होगा, यदि मुसलमान डॉ. जानसन का तरीका अपनाने का निश्चय कर लें और कहें कि भाड़ में जाएं तुम्हारे तर्क, हम तो पाकिस्तान चाहते हैं। आलोचकों को समझना चाहिए कि ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के मसले को बिगाड़ने के लिए यदि उनकी मजबूरियों पर भरोसा किया गया, तो बिल्कुल बेकार होगा। इसलिए पाकिस्तान की त्रुटियों के तर्क का आनंद लेना निरर्थक है।
अब उस दूसरे प्रश्न को लिया जाए, जो मैंने कहा है कि आलोचक मुझसे पूछने