370 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
के अधिकारी हैं। जो आपत्तियां मैंने प्रस्तुत की हैं, उन्हें देखते हुए पाकिस्तान के मामले में मेरी क्या राय है? अपनी राय के विषय में मुझे कोई संशय नहीं है। मेरा दृढ़ मत है कि कुछ स्थितियों के बने रहने पर, जो आगामी अध्यायों में उल्लिखित हैं, यदि मुसलमान पाकिस्तान लेने पर तुले हुए हैं तो वह उन्हें दिया जाना चाहिए। मैं जानता हूं कि मेरे आलोचक मुझ पर तुरंत बेमेल बात कहने का लांछन लगाएंगे और ऐसे असाधारण निष्कर्ष निकालने के कारण मुझसे पूछेंगे - असाधारण उस दृष्टिकोण के कारण जो कि मैं इस अध्याय के पहले भाग में प्रकट कर चुका हूं कि पाकिस्तान के पक्ष के मुस्लिम विवाद में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे मजबूर करने वाली ताकत कहा जा सके, जो कि निर्दयी भाग्य-निर्णायक कही जाती है। पाकिस्तान के मसले में जो कमियां मैंने गिनाई हैं, उनमें से किसी को भी मैं वापस नहीं लेना चाहता। फिर भी मेरा विचार है कि यदि मुसलमानों को पाकिस्तान चाहिए तो उन्हें वह दिए बिना कोई बचाव नहीं है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के बाद भी मैं यह निस्संकोच कह सकता हूं कि पाकिस्तान के तर्क में कोई दम नहीं है। मेरे फैसले में दो निर्देशक कारक हैं जो मसले का फैसला करने वाले हैं। पहला है भारत की सुरक्षा, और दूसरा है मुसलमानों की भावना। मैं बताऊंगा कि मैं उन्हें फैसला करने के योग्य क्यों समझ हूं और किस प्रकार वे मेरे विचार से पाकिस्तान के पक्ष में जाते हैं।
पहले प्रथम प्रश्न लिया जाए। कोई इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि स्वतंत्रता पा लेना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना उसे बनाए रखने के लिए पक्के साधनों का पाना। स्वतंत्रता को मजबूत रखने वाली तो अंततोगत्वा एक भरोसेमंद फौज है - ऐसी फौज, जिस पर हर समय और किसी भी घटनाकाल में देश के लिए लड़ने का विश्वास किया जा सके। भारत में फौज अवश्य ही संयुक्त होगी, जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों रहेंगे। यदि भारत पर किसी विदेशी शक्ति का आक्रमण होता है तो क्या फौज में शामिल मुसलमानों पर भारत की रक्षा का भरोसा किया जा सकता है? मान लीजिए कि हमलावर उनके सहधर्मी हैं, तो क्या मुसलमान उनकी तरफ हो जाएंगे या वे उनका सामना करेंगे और भारत को बचाएंगे? यह अत्यंत अहम प्रश्न है। स्पष्टतया इस प्रश्न का उत्तर इस पर निर्भर करेगा कि फौज में शामिल मुसलमानों को राष्ट्र सिद्धांत, जो कि पाकिस्तान की नींव है, की छूत कहां तक लग गई है। यदि उन्हें यह छूत लग गई है तो भारत में फौज खतरे से खाली नहीं हो सकती। भारत की स्वतंत्रता की संरक्षिका होने के बजाए वह उसके लिए एक धमकी और भारी
खतरा बनी रहेगी। मैं यह मानता हूं। अंगे्रज जो तर्क देते हैं कि उनके द्वारा पाकिस्तान को अस्वीकृत कर देना भारत के हित में होगा, यह सुनकर मैं सुन्न हो जाता हूं। कुछ हिंदू भी यही स्वर अलापते हैं। मैं विश्वास करता हूं कि या तो वे जानते नहीं