क्या पाकिस्तान बनना चाहिए
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हैं कि भारत की स्वतंत्रता में निर्धारक कारक क्या हैं या वे भारत की रक्षा की बात एक स्वतंत्र देश के आशय से नहीं करते, जो अपनी सुरक्षा का स्वयं उत्तरदायी हो, बल्कि अंग्रेजों के एक अधिकृत देश के नाते करते हैं, जिसकी वे अनधिकार प्रवेश करने वाले से रक्षा करें। यह दृष्टिकोण बिल्कुल गलत है। प्रश्न यह नहीं है कि क्या अंगे्रज भारत का विभाजन न होने की स्थिति में बेहतर तरीके से भारत की रक्षा कर सकेंगे। प्रश्न यह है कि क्या भारतीय जन स्वतंत्र भारत की रक्षा कर सकेंगे? मैं फिर दोहराता हूं कि एक ही उत्तर है कि भारतीय स्वतंत्र भारत की रक्षा एक ही दशा में कर सकेंगे, अर्थात् यदि भारत में फौज अराजनीतिक रहती है, पाकिस्तान के जहर से अछूती। भारतीयों को मैं फौज के प्रश्न को उठाए बिना स्वराज्य पर विचार-विमर्श की वाहियात आदत के खिलाफ चेतावनी देता हूं, जो इस देश में पैदा हो गई है। इससे बढ़कर घातक कुछ नहीं हो सकता, यदि यह न समझा जाए कि राजनीतिक फौज भारत की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। ऐसी स्थिति किसी भी फौज के न होने से भी बुरी है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि फौज वह अंतिम स्वीकृति है, जो देश में सरकार को उस समय संभालती है, जब कोई विद्रोही या अडि़यल तत्व उसे चुनौती देता है। मान लीजिए कि तत्कालिक सरकार कोई ऐसी नीति अपनाती है, जिसका मुसलमानों का एक वर्ग घोर विरोध करता है। मान लीजिए प्रस्तुत सरकार को उस नीति का पालन कराने के लिए फौज को इस्तेमाल करने की जरूरत पड़ती है। तो क्या वह सरकार मुसलमानों पर भरोसा कर सकती है कि वे उसका आदेश मानेंगे और मुसलमान विद्रोहियों को गोली मार देंगे? यह फिर उसी बात पर निर्भर है कि कहां तक मुसलमानों को दो राष्ट्र सिद्धांत की छूत लग चुकी है। यदि उन्हें यह छूत लग चुकी है तो भारत एक विश्वसनीय और सुरक्षित सरकार नहीं बना सकता।
अब दूसरे महत्वपूर्ण कारक पर विचार करें, तो हिंदू जनता राजनीति में भावना को शक्ति के रूप में कोई महत्व देती नहीं जान पड़ती। मुसलमानों के विरुद्ध जीतने के लिए हिंदू दो कारणों पर भरोसा करते जान पड़ते हैं। पहला यह है कि भले ही हिंदू और मुसलमान दो राष्ट्र हों, वे एक राज्य में रह सकते हैं। दूसरा यह कि पाकिस्तान मुसलमानों की एक बलवती भावना पर आधारित है न कि स्पष्ट तर्कों पर। मैं नहीं जानता कि हिंदू ऐसे तर्कों से अपने को कब तक मूर्ख बनाएंगे। यह सत्य है कि पहला तर्क पूर्वोदाहरण के बिना नहीं है। साथ ही इसे समझने में अधिक बुद्धि की आवश्यकता नहीं कि इसका महत्व अत्यंत सीमित है। दो राष्ट्र और एक राज्य एक अच्छा बहाना है। इसमें वही आकर्षण है, जो एक धर्मोपदेश में होता है और इसका परिणाम मुस्लिम नेताओं का बदल जाना हो सकता है। किंतु एक धर्मोपदेश की तरह