अधःपतन से मुक्ति
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परिवहन को सुधारा है, नाममात्र के शुल्क पर पत्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजने की व्यवस्था की है, तार भेजने की व्यवस्था की है, मुद्रा में सुधार किया है, माप-तौल-प्रणाली का नियमन किया है, भूगोल, नक्षत्र-विद्या और औषधियों के बारे में उनकी सोच को सही किया है और उनके आंतरिक झगड़ों को रोका है, तथा उनकी आर्थिक हालत भी एक सीमा तक सुधरी है। सरकार के इन भलाई वाले कामों के बावजूद, क्या कोई भारतीयों से यह कहता है कि वे अंग्रेजों का आभार मानें और स्वशासन या स्वराज के लिए आंदोलन करना छोड़ दें? अथवा क्या सामाजिक उत्थान के इन कार्यों के कारण भारतीयों ने अंग्रेजों द्वारा उनसे किए जाने वाले शासित जाति के व्यवहार का विरोध करना छोड़ दिया है? स्पष्ट है कि भारतीयों ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। वे इन कल्याण-कार्यों से संतुष्ट नहीं हुए और अपना शासन स्वयं चलाने के अधिकार की प्राप्ति के लिए आंदोलन जारी रखा हुआ है। होना भी यही चाहिए जैसा कि आइरिश देशभक्त क्यूरेन ने कहा था, कोई भी व्यक्ति अपने आत्मसम्मान की कीमत पर किसी का आभारी नहीं हो सकता, कोई भी महिला अपने स्त्रीत्व की कीमत पर किसी का आभार व्यक्त नहीं कर सकती और कोई भी राष्ट्र अपनी गौरव-गरिमा की कीमत पर किसी का आभारी नहीं बन सकता। इसके विपरीत, कोई भी व्यवहार यही दर्शाएगा कि उसका जीवन-दर्शन वैसा ही है, जिसे कार्लाइल ने ‘शूकर दर्शन’ का नाम दिया है। ऐसा लगता है कि कांग्रेस हाईकमान को यह अनुभूति ही नहीं हो पा रही है कि मुसलमान और अन्य अल्पसंख्यक कांग्रेस के द्वारा दिए जा रहे सुझावों की अपेक्षा अपनी पहचान और आत्म-सम्मान को ज्यादा महत्व देते हैं। जो लोग अपने आत्म-सम्मान के बारे में अधिक सजग हैं, वे ऐसे ‘शूकर’ नहीं हैं जो सिर्फ ऐसे भोजन के लिए ही चिंतित रहते हैं जिससे उनका मोटापा और बढ़े। उनमें जो गौरव-बोध है, उसे वे स्वर्ग के बदले भी त्याग देने के लिए तैयार नहीं होंगे। संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि ‘भोजन से जीवन अधिक मूल्यवान है।’
यह कहने का कोई लाभ नहीं कि कांग्रेस हिंदू संगठन नहीं है। एक ऐसा संगठन जो अपने गठन में हिंदू ही है, वह हिंदू मानस की ही अभिव्यक्ति करेगा और हिंदू-आकांक्षाओं का ही समर्थन करेगा। कांग्रेस और हिंदू महासभा में इतना ही अंतर है कि जहां हिंदू महासभा अपने कथनों में अधिक अभद्र है और अपने कृत्यों से भी कठोर है, वहीं कांग्रेस नीति-निपुण और शिष्ट है। इस तथ्यगत अंतर के अलावा कांग्रेस और हिंदू महासभा के बीच कोई अंतर नहीं है।
इसी तरह, यह कहने का भी कोई लाभ नहीं कि कांग्रेस शासक और शासित के बीच कोई अंतर नहीं मानती। यदि ऐसा ही है तो कांग्रेस को अन्य समुदायों को स्वतंत्र और बराबर का सहभागी मानकर अपनी सदाशयता का परिचय देना चाहिए। ऐसी मान्यता की कसौटी क्या है? मेरी राय में तो एक ही कसौटी हो सकती है -