13. क्या पाकिस्तान बनना चाहिए? - Page 381

372 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

कहे जाने के बजाए यदि इसे अध्यादेश के रूप में निकालने और मुसलमानों से मनवाने का इरादा किया जाता है तो ऐसा करना एक पागलपन भरी योजना होगी, जिसे कोई भी स्वस्थ चित्त मनुष्य नहीं मानेगा। मुझे विश्वास है कि इससे स्वराज्य का उद्देश्य ही मारा जाएगा। दूसरा तर्क भी इतना ही मूर्खतापूर्ण है। पाकिस्तान का मुस्लिम भावना की नींव पर खड़ा होना कमजोरी की बात बिल्कुल नहीं है। वह वास्तव में इसका प्रबल तर्क-बिंदु है। यह जानने के लिए राजनीति की गहरी समझ की जरूरत नहीं है कि संविधान के कार्यान्वयन की क्षमता मुख से कह-भर देने की बात नहीं है। यह भावना का विषय है। एक संविधान को कपड़ों की तरह अनुकूल और मनमोहक होना चाहिए। यदि वह मनोहारी नहीं है तो चाहे जितना भी पूर्ण हो, काम नहीं कर सकता। यदि ऐसा संविधान बनता है जो एक निश्चित वर्ग की प्रबल भावनाओं के विपरीत जाता है, तो वह एकदम विद्रोह भले ही पैदा न करे, विनाशकारी तो होगा ही।

हिंदू यह बात नहीं समझ रहे हैं कि मान लीजिए एक भरोसेमंद फौज है, तो सैन्य-शक्तियों द्वारा लोगों पर शासन करना किसी देश की सामान्य विधि नहीं है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि शक्ति राजनीतिक शरीर की औषधि है और शरीर के रोगी होने पर प्रयुक्त होनी चाहिए। किंतु राजनीतिक शरीर की औषधि होने से ही शक्ति को उसकी नित्य की खुराक नहीं बनाया जा सकता। एक राजनीतिक शरीर को प्राकृतिक रूप से काम करना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कि राजनीतिक शरीर के विभिन्न घटक तत्व साथ-साथ काम करने की इच्छा रखें और यथावत गठित प्राधिकार द्वारा बनाए गये नियमों और आदेशों का पालन करने को तैयार हों। मान लीजिए संयुक्त भारत के लिए नए संविधान में वे सभी बातें मौजूद हैं, जो मुसलमानों के हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। किंतु मान लीजिए मुसलमानों ने कह दिया कि ‘आपकी सुरक्षा के लिए आपको धन्यवाद, हम आपसे शासित होना नहीं चाहते’ और मान लीजिए वे विधान सभा का बहिष्कार करते हैं, कानून को मानने से इन्कार करते हैं, करों को देने का विरोध करते हैं, तो क्या होगा? क्या हिंदू अपनी संगीनों के बल पर मुसलमानों से आज्ञा मनवाने को तैयार हैं? क्या स्वराज लोगों की सेवा करने का अवसर होगा या हिंदुओं के लिए मुसलमानों को और मुसलमानों के लिए हिंदुओं को जीतने का मौका। स्वराज होना चाहिए लोगों के द्वारा, लोगों के लिए, लोगों का शासन। यह स्वराज का यथार्थ हेतु है और स्वराज का एकमात्र औचित्य। यदि स्वराज को ऐसे युग में प्रवेश करना है जिसमें हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के विरुद्ध योजना बनाने में लगे होंगे, हरेक अपने प्रतिद्वंद्वी को जीतने की साजिश में लगा होगा तो हमें स्वराज क्यों लेना चाहिए और प्रजातांत्रिक राष्ट्रों को ऐसे स्वराज को अस्तित्व में ही क्यों आने देना चाहिए? यह जाल छल और पथ भ्रष्टकारी होगा।