13. क्या पाकिस्तान बनना चाहिए? - Page 387

378 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय

गैर-मुस्लिम है। हिंदू महासभा उस क्षेत्र को भी हिंदुस्तान में सम्मिलित करने के अपने दावे के साथ अग्रसर है, क्योंकि वहां का शासक हिंदू है, यद्यपि अधिकांश जनता वहां मुस्लिम है। इस प्रकार इन अजीब और परस्पर-विरोधी दावों के पीछे एकमात्र तथ्य यह है कि पाकिस्तान बनाने की इच्छुक दोनों हिंदू और मुस्लिम पार्टियां, आत्मनिर्णय के सिद्धांत को दूषित करने और पलटने में व्यस्त हैं, जिसके फलस्वरूप वे सुसंगठित रूप से उस क्षेत्रीय लूट को पूर्ण करने में स्वयं को न्यायसंगत ठहराते रहते हैं, जिसमें शायद वे अब भी अपने को व्यस्त रखे हुए हैं। भारत उस समय पूर्ण अव्यवस्था में पड़ जाएगा, जब इसके क्षेत्रों के पुनर्विभाजन का प्रश्न सामने आएगा और यदि जनता इस बात को नहीं समझती कि आत्मनिर्णय का वास्तविक स्वरूप क्या है, और उस सिद्धांत पर बने रहने की ईमानदारी उसमें नहीं है, और उससे होने वाले परिणामों को भुगतने को वह तत्पर नहीं है। इसलिए इस साधारण बात पर बल देना आवश्यक है कि आत्मनिर्णय एक ऐसा मुद्दा है जो केवल जनता द्वारा किया जाता है। दूसरा जो विचारणीय दृष्टिकोण है वह यह है कि आत्मनिर्णय के सिद्धांत को किस मात्रा में व्यवहृत करना उपयुक्त है? जैसा कि श्री ओ.कोनर ने कहा हैऽ-

फ्इस विषय पर जो कुछ कहा जा सकता है, वह यह है कि सामान्य रूप

से यह ठोस काम करने का एक तरीका है, जिसका आधार न्याय है और

जिसे एकरूपता, शांति तथा जनता को अपने स्वयं के तरीके द्वारा विकसित

करने के लिए अपनाया जाता है। परंतु यह उन परिस्थितियों पर निर्भर है,

जिसके लिए आकार और भौगोलिक स्थितियां कुछ हद तक आवश्यक होती

हैं। नियम परिस्थितियों पर विजयी होते हैं अथवा परिस्थितियां नियमों पर

विजय प्राप्त करती हैं, यह व्यक्ति की सामान्य बुद्धि अथवा न्याय अथवा

अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम कल्याण के संदर्भ पर निर्धारित है। यदि

इन तीनों बातों को भली-भाँति समझा जाए तो वास्तव में ये एक ही बात

को व्यक्त करने के तीन भिन्न-भिन्न तरीके हैं। किसी एक विशेष मामले

का समाधान करने के लिए बहुत बड़ी कठिनाइयां उठ सकती हैं। जहां एक

ओर तथ्य होते हैं, वहीं दूसरी ओर भी तथ्य होते हैं। एक प्रकार के तथ्य

कुछ व्यक्तियों को विशेष रूप से अपील करते हैं और कुछ दूसरे तथ्य

दूसरों को किंचित मात्र अथवा बिल्कुल ही अपील नहीं करते। इस प्रकार

की समस्या आ सकती है, जिसमें कोई ऐसे निश्चित निष्कर्ष न निकलें

जिन्हें आम आदमी मानता हो। कुछ मामले ऐसे होते हैं, जिनमें यह कहना

ऽ हिस्ट्री ऑफ आयरलैंड, खंड दो