पाकिस्तान की समस्याएं
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संघटक ईकाइयां स्वायत्त-शासी तथा प्रभुतासम्पन्न हों।य्
क्रिप्स के उन प्रस्तावों पर, जिन्हें कोई भी व्यक्ति पढ़कर समझ सकता है, मुस्लिम लीग द्वारा पारित प्रस्ताव से यह सुस्पष्ट हो जाता है कि मुस्लिम लीग की तो यही स्थिति चलती रही, परंतु श्री जिन्ना ने अपनी विचारधारा बदल दी। 16 नवंबर, 1942 को जालंधर में एक सार्वजनिक सभा में श्री जिन्ना ने यह कहा था-
फ्जान-बूझकर अबोध जनता को गुमराह करने तथा चक्कर में डालने के
लिए उन लोगों द्वारा जो छल-प्रपंच से यह खेल खेल रहे हैं हाल ही में
की गई चालाकी - चालाकी के अतिरिक्त जिसे मैं और कुछ नहीं कह
सकता- यह है कि आत्मनिर्णय का अधिकार मुसलमानों तक ही क्यों
सीमित रहे, और इसको अन्य जातियों तक क्यों न बढ़ा दिया जाए? यह
कह कर कि सबको आत्मनिर्णय का अधिकार है, वे कहते हैं कि पंजाब
और उसी की तरह पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत तथा सिंध को अनेक छोटे-छोटे
टुकड़ों में बांट दिया जाए। इस प्रकार तो सैंकड़ों पाकिस्तान बन जाएंगे।य्
उप-राष्ट्रीय समुदाय
फ्इस सूत्र का प्रवर्तक कौन है कि संपूर्ण भारत में आत्मनिर्णय का अधिकार
प्रत्येक जाति को है? या तो यह एक महान मूर्खता है, या शैतानी अथवा
चालाकी। मैं उन्हें उत्तर देता हूं। मुसलमान आत्मनिर्णय का दावा इसलिए
करते हैं क्योंकि वे उस प्रदत्त प्रदेश पर एक राष्ट्रीय समुदाय हैं, जो उनका
घर है और उन क्षेत्रों में जहां वे बहुसंख्यक हैं। क्या इतिहास में कहीं इस
बात का उल्लेख है कि ऐसे राष्ट्रीय समुदाय जो समस्त प्रदेश में छिटके
हुए हैं, उन्हें एक राज्य का स्वरूप दे दिया गया हो? उनके लिए आप
कहां से राज्य उपलब्ध कराने जा रहे हैं? ऐसे मामले में आपके पास 14
प्रतिशत मुसलमान उत्तर प्रदेश में हैं। उनके लिए क्यों नहीं एक राज्य हो?
मुसलमान उत्तर प्रदेश में एक राष्ट्रीय समुदाय नहीं हैं, वे बिखरे हुए हैं।
अतः संवैधानिक भाषा में वे एक ऐसे उप-राष्ट्रीय समुदाय हैं, जिनको इससे
अधिक और किसी बात की उम्मीद नहीं है, और जो एक सुसंस्कृत सरकार
द्वारा किसी अल्पसंख्यक समुदाय को दी जा सकती है। अपनी दृष्टि से
मैंने स्थिति स्पष्ट कर दी है। मुसलमान एक उप-राष्ट्रीय समुदाय नहीं है,
यह उनका जन्मसिद्ध अधिकार है कि वे अपने आत्मनिर्णय के अधिकार
के उपयोग का दावा करें।य्ऽ
ऽ ईस्टर्न टाइम्स (लाहौर), 17 नवंबर, 1942