पाकिस्तान की समस्याएं
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भूलेंगे। पंजाब और बंगाल में गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों से यह कहना बेकार है कि उन्हें अपने हितों की सुरक्षा को लेकर संतुष्ट हो जाना चाहिए। यदि मुसलमान हिंदू बहुमत के आतंक के विरुद्ध अपने हितों की सुरक्षा के साथ संतुष्ट नहीं हो सकते, तो हिंदुओं से यह अपेक्षा क्यों की जाती है कि मुस्लिम बहुत के आतंक के विरुद्ध उन्हें अपने हितों की सुरक्षा के साथ संतुष्ट हो जाना चाहिए। मुसलमान हिंदुओं से कह सकते हैं कि ‘आपके हितों की सुरक्षा को धिक्कार है, हम आपके द्वारा शासित नहीं होना चाहते।’ यह एक ऐसा तर्क है, जिसका श्री कार्सन ने रेडमांड के विरुद्ध प्रयोग किया था। ऐसा ही तर्क प्रत्युत्तर में पंजाब और बंगाल के हिंदुओं द्वारा मुसलमानों को दिया जा सकता है।
दरअसल इस प्रकार की मनोवृत्ति के कारण पाकिस्तान की समस्या का शांतिपूर्ण समाधान संभव नहीं होगा। सबसे पहले, यह वह खेल है, जिसे दो व्यक्ति खेल सकते हैं। दूसरे शब्दों में, हथियार शक्ति का प्रतीक हो सकते हैं, परंतु हथियारों का होना पर्याप्त नहीं है। जैसा कि रूसों ने कहा- फ्सबसे ताकतवर हमेशा ही मालिक नहीं बना रह सकता। इसके लिए उसे अपनी ताकत को सही दिशा और अपनी आज्ञाकारिता को कर्तव्य में परिवर्तित करना होगा।य् लीग को देखना चाहिए कि पाकिस्तान के प्रति उसका दावा मर्यादा के अनुकूल हो।
VI
सीमाओं की समस्या के विषय में इतना ही काफी है। अब मैं अल्पसंख्यकों की उस समस्या की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ जो सीमाओं के पुनः निर्धारण के उपरांत भी पाकिस्तान में बनी रहेंगी। उनके हितों की रक्षा करने के दो तरीके हैं।
सबसे पहले, अल्पसंख्यकों के राजनीतिक और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के लिए संविधान में सुरक्षा उपाय प्रदान करने हैं। भारतीयों के लिए यह एक सुपरिचित मामला है और इस पर विस्तार से विचार करना आवश्यक है। दूसरा तरीका है पाकिस्तान से हिंदुस्तान में उनका स्थानांतरण करने की स्थिति पैदा करना। अधिकांश जनता इस समाधान को अधिक पसंद करती है और वह पाकिस्तान की स्वीकृति के लिए तैयार और इच्छुक हो जाएगी, यदि यह प्रदर्शित किया जा सके कि जनसंख्या का आदान-प्रदान संभव है। परन्तु इसे वे होश उड़ा देने वाली और दुरूह समस्या समझते हैं। निस्संदेह यह एक आतंकित दिमाग की निशानी है। यदि मामले पर ठंडे और शांतिपूर्ण ढंग से विचार किया जाए तो पता लग जाएगा कि यह समस्या न तो होश उड़ाने वाली है और न दुरूह।