388 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
(2) देशांतर करने वाले की अचल संपत्ति के विक्रयार्थ उक्त
आयोग आवश्यक कदम उठाएगा।य्
क्षतिपूर्ति तथा पेंशन आदि के भुगतान के लिए निर्दिष्ट मुद्रा की कठिनाई को संधि में निम्नलिखित धारा जोड़कर पर्याप्त रूप से दूर किया जा सकता है-
फ्(1) प्रवास करने वाले की अचल संपत्ति का विक्रय मूल्य और अनुमानित
मूल्य का अंतर देश की उस सरकार द्वारा, जहां से उसने प्रस्थान किया
है, आयोग को भुगतान किया जाएगा। इस धनराशि का 1/4 भाग मुद्रा में
तथा 3/4 भाग का स्वर्ण में अथवा अल्पावधि के स्वर्ण बांड्स में भुगतान
होगा।
(2) इस प्रकार दूसरे देश में जाने वाले की अचल संपत्ति का
निश्चित मूल्य आयोग द्वारा उसे दे दिया जाएगा।
(3) समस्त नागरिक तथा सैनिक पेंशन, जो प्रवासी द्वारा उस
दिन तक उपार्जित की गई है जिस दिन उक्त संधि पर हस्ताक्षर हुए हैं,
सरकार के देय हिसाब में परणित कर दी जाएगी, जिसका भुगतान आयोग
को कर दिया जाएगा, जिससे संपत्ति के स्वामी को उसका भुगतान मिल
सके।
(4) प्रवासियों को सुविधा प्रदान करने के लिए आयोग में इच्छुक
राज्य आयोग को आवश्यक धन का भुगतान करेंगे।य्
जनसंख्या के स्थानांतरण से संबंधित कठिनाइयों को दूर करने के लिए क्या उक्त उपबंध पर्याप्त नहीं हैं? वास्तव में कुछ और भी कठिनाइयां हैं। परंतु वे भी ऐसी नहीं हैं जिन्हें दूर नहीं किया जा सके। उनमें नीति का प्रश्न सन्निहित है। पहला प्रश्न तो यह है कि जनसंख्या को स्थानांतरित करना अनिवार्य होगा अथवा यह स्वैच्छिक रहे? दूसरा प्रश्न यह है कि राज्य से सहायता प्राप्त ऐसा स्थानांतरण क्या सबके लिए खुला है, अथवा वर्ग विशेष तक ही सीमित है? तीसरा प्रश्न यह है कि सरकार कब तक इन उपबंधों, विशेषतः अचल संपत्ति के विक्रय मूल्य पर हुई क्षति-पूर्ति के उपबंध, को मानने के लिए बाध्य है? क्या इन उपबंधों की कोई समय-अवधि होनी चाहिए अथवा ये अनिश्चित काल तक बना रहे?
पहले मुद्दे के संदर्भ में कहा जा सकता है कि दोनों बातें संभव हैं और ऐसे उदाहरण भी हैं जहां पर दोनों बातों का प्रभावी उपयोग किया गया है। ग्रीस और बल्गेरिया के बीच जनसंख्या का स्थानांतरण ऐच्छिक आधार पर था, जबकि ग्रीस और तुर्की के बीच यह अनिवार्य था। अनिवार्य स्थानांतरण पहली दृष्टि में गलत प्रतीत होता है।