390 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
दी जा सकती है। इसमें कुछ भी असंगत नहीं है। कल्पना अथवा तर्क का यही नियम उन असैनिक कर्मचारियों के विषय में भी लागू होता है, जो राजनीतिक परिवर्तन के समय आनुपातिक पेंशन के आधार पर अवकाश ग्रहण करने की आज्ञा प्राप्त कर चुके होते हैं, यदि वे अवधि के बीत जाने को छोड़कर एक निश्चित अवधि के अंतर्गत अवकाश ग्रहण कर लेते हैं।
मेरे सुझाव के अनुसार उक्त मामलों में नीति का कार्यान्वयन संधि में निम्न धारा जोड़ देने पर हो सकता है-
फ्इस संधि के अंतर्गत कोई भी व्यक्ति जो किसी अल्पसंख्यक जाति
का है और जिसकी आयु 18 वर्ष से ऊपर है, स्वेच्छा से देशांतर गमन
करने के अधिकार का प्रयोग कर सकता है।
फ्आयोग के समक्ष की गई घोषणा उक्त अधिकार का प्रयोग करने
के पीछे छिपी भावना का पर्याप्त प्रमाण होगी।
फ्पति की इच्छा पत्नी की इच्छा समझी जाएगा। माता और पिता
तथा अभिभावकों की इच्छा उनके 16 वर्ष से कम आयु वाले बच्चों अथवा
संरक्षित व्यक्तियों की इच्छा मानी जाएगी।
फ्इस संधि के अंतर्गत प्रदत्त लाभ का अधिकार उस समय समाप्त
हो जाएगा, यदि देशांतर गमन के विकल्प का प्रयोग संधि पर हस्ताक्षर
करने की तिथि से पांच वर्ष के अंदर नहीं किया जाता।
फ्आयोग के कार्यारंभ करने की तिथि से पांच वर्ष की अवधि के
बीत जाने पर आयोग का कार्य 6 मास के अंदर समाप्त हो जाएगा।य्
उपर्युक्त मामले में खर्च का हिसाब-किताब क्या होगा? यदि स्थानांतरण अति आवश्यक है तो यह प्रश्न अनिवार्य है। स्थानांतरण की ऐच्छिक योजना राज्य पर भारी वित्तीय भार नहीं डाल सकती। स्वतंत्रता की अपेक्षा मनुष्य संपत्ति को अधिक प्यार करता है। अनेक व्यक्ति अपने स्थाई आवास में परिवर्तन करने की अपेक्षा अपने राजनीतिक स्वामियों के हाथों उत्पीड़न सहना अधिक पसंद करेंगे। जैसा कि एडम स्मिथ ने कहा है, स्थानांतरण के मामले में आदमी को ढोना सबसे कठिन काम है। अतः खर्च से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है। इसकी कार्य-क्षमता कैसी होगी? यह योजना नई नहीं है। इसका परीक्षण किया गया है और इसे कार्य करने के योग्य पाया गया है। अत यूरोपियन युद्ध के उपरांत ग्रीस और बल्गारिया तथा