कौन निर्णय कर सकता है?
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सीमा आयोग द्वारा क्षेत्रों के सीमांकन के पश्चात् बहुत ही संभावनाएँ सामने आ सकती हैं। पाकिस्तान की सीमाओं के निर्धारण के बाद मुसलमान रुक सकते हैं। वे यह सोचकर संतुष्ट हो सकते हैं कि जो भी हो, पाकिस्तान का सिद्धांत मान लिया गया है, जो सीमांकन का अर्थ है। मान लीजिए मुसलमान सीमांकन मात्र से संतुष्ट नहीं होते और पाकिस्तान की स्थापना चाहते हैं, तो उनके लिए दो रास्ते खुले हैं। वे पाकिस्तान की तुरंत स्थापना चाह सकते हैं या एक ही केंद्रीय सरकार के शासन में कुछ समय तक, दस साल कह लीजिए, रह सकते हैं और हिंदुओं का साथ परीक्षण के तौर पर कर सकते हैं। हिंदुओं को यह दिखाने का अवसर मिलेगा कि अल्पसंख्यक उन पर भरोसा कर सकते हैं। मुसलमान अनुभव करके जानेंगे कि हिंदु राज से उनका भय कहां तक उचित है। और भी एक संभावना है। मुसलमान तुरंत अलग होने का निश्चय करने के बाद, कालांतर में पाकिस्तान से इतने हताश हो सकते हैं कि वे फिर वापस आकर भारत में मिलना और एक संविधान की प्रजा बनना पसंद करें।
ये कुछ ऐसी संभावनाएं हैं, जो मुझे सूझती हैं। मैं तो कहूंगा कि इन संभावनाओं को घटित होने के लिए समय और परिस्थितियों पर छोड़ देना चाहिए। मुसलमानों से यह कहना मुझे गलत लगता है कि यदि तुम भारत के एक अंग बनकर रहना चाहते हो, तो तुम कभी बाहर नहीं जा सकते या यदि तुम जाना चाहते हो, तो फिर कभी वापस नहीं आ सकते। अपनी योजना में मैंने द्वार खुला रखा है और अधिनियम में इन दोनों संभावनाओं को स्थान दिया हैः (1) इस वर्षों के अलगाव के बाद एकता के लिए (2) दस वर्षों तक अलगाव और उसके बाद एकता के लिए। मैं व्यक्तिगत रूप से दूसरे विकल्प को पसंद करता हूं, यद्यपि किसी के पक्ष में मेरा दृढ़ मत नहीं है। यह बेहतर होगा कि मुसलमान पाकिस्तान का तर्जुबा कर लें। पाकिस्तान के तजुर्बे के बाद की एकता अवश्य स्थायी और शाश्वत होगी। यदि पाकिस्तान शीघ्र अस्तित्व में आता है, तो मुझे यह जरूरी जान पड़ता है कि पूर्ण अलगाव नहीं होना चाहिए। पाकिस्तान और हिंदुस्तान के बीच जीवन-संपर्क बनाए रहना जरूरी है ताकि विच्छेद उत्पन्न करने वाली तथा पुनः एकीकरण को रोकने वाली संभावनाओं को रोका जा सके। इस अधिनियम में तद्नुसार राज्य परिषद को स्थान दिया गया है। इसे संघ समझने की भूल नहीं की जा सकती। यह कोई महासंघ नहीं है। इसे केवल एक कड़ी के रूप में पाकिस्तान और हिंदुस्तान को तब तक बांधे रखना है, जब तक वे एक संविधान के भीतर एक न हो जाएं।
ऐसी मेरी योजना है। यह जातीय मताधिकार पर आधारित है। योजना लचीली है। इसमें इस बात का विचार कर लिया गया है कि यह हिंदू भावना के विरुद्ध है। इसमें इस तथ्य पर भी विचार कर लिया गया है कि पाकिस्तान की मुस्लिम मांग अस्थायी