कौन निर्णय कर सकता है?
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करना चाहते हैं, तो उन्हें यह कहना अविवेकपूर्ण होगा कि यदि वे एक बार साथ आ गए तो सदा के लिए एक साथ हो जाएंगे और कभी अलग नहीं हो सकेंगे।
फ्उनसे यह कहना अधिक बुद्धियुक्त होगा कि वे अंदर प्रवेश कर सकते हैं और यदि उन्हें महसूस होता है कि वे एक सामान्य निर्णय पर नहीं पहुँच सकते, तब उन्हें, जो दूसरे दरवाजे से पुनः बाहर जाने के इच्छुक हैं, रोकने के लिए कोई बाधा नहीं है। यदि उन्हें इस बात का ज्ञान है कि वे स्वेच्छापूर्वक बाहर जा सकते है तो वे और अधिक प्रवेश करना चाहेंगे।
भारत के प्रांतों के विषय में हमारा कहना यह है। एक सामान्य संविधान की रचना के लिए इकट्ठे होकर आइए, यदि आप अपने समस्त विवादों तथा संविधान निर्मात्री परिषद की विचार-विमर्श की कार्यवाही के उपरांत यह समझते हैं कि आप अपने मतभेदों को दूर नहीं कर सकते और कुछ प्रांत संविधान से संतुष्ट नहीं हैं, तब ऐसे प्रांत संघ से बाहर निकल सकते हैं और बाहर रह सकते हैं, और यदि वे चाहें तो उनके लिए उसी अंश का स्वराज और स्वतंत्रता उपलब्ध होगी जैसी स्वयं संघ की, अर्थात् पूर्ण स्वतंत्रता।य्
तस्वीर को पूर्ण करने के लिए पे्रस कांफ्रेंस में और आगे विवरण जोड़े गए। प्रांतों द्वारा सम्मिलित होने या पृथक रहने की योजना का उल्लेख करते हुए सर स्टफोर्ड क्रिप्स ने कहा-
फ्यदि विधान निर्मात्री परिषद की कार्रवाई के अंत में कोई प्रांत नए संविधान को स्वीकार करने की इच्छा नहीं करता और संघ में सम्मिलित नहीं होता, तो वह संघ से बाहर रहने के लिए स्वतंत्र है, बशर्ते उस प्रांत की विधान सभा पर्याप्त मतों, अर्थात् 60 % से कम नहीं, से सम्मिलित होने के विरुद्ध निश्चय करे। यदि यह मत 60 % से कम है, तो अल्पसंख्यक जाति जनमत जानने के लिए संपूर्ण प्रांत के मताधिकार का दावा कर सकेगी। मताधिकार के मामले में केवल बहुमत पर्याप्त होगा। संघ में सम्मिलित होने की प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए संबंधित प्रांतीय धारा सभा से निश्चित मत प्राप्त होना चाहिए। सम्मिलित न होने वाले प्रांत, यदि वे चाहें तो, एक पृथक संविधान निर्मात्री परिषद द्वारा एक नवीन संघ बनाकर उसमें सम्मिलित हो सकते हैं, परंतु ऐसे संघ को व्यवहार्य बनाने के लिए उन्हें भौगोलिक दृष्टि से जुड़ा हुआ होना चाहिए।