406 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय
हिंदुओं द्वारा किया गया? वास्तव में बंबई या मद्रास के लोगों का यह काम नहीं है कि वे कहें-पाकिस्तान बनना चाहिए। यह उन लोगों के निर्णय पर छोड़ देना चाहिए जो उस क्षेत्र में रह रहे हैं और जिन्हें उस राजनीतिक और आर्थिक प्रणाली में, जिसमें वे वर्षों तक रहे हैं, भारी, क्रांतिकारी और मूलभूत परिवर्तनों के परिणाम भुगतने हैं। मेरी समझ में पाकिस्तान प्रांतों में जनमत-संग्रह पाकिस्तान-समस्या के समाधान का सर्वोत्तम सुरक्षात्मक संवैधानिक तरीका है।
परंतु मुझे भय है कि जनमत-संग्रह द्वारा पाकिस्तान के प्रश्न का समाधान कितना ही आकर्षक हो, समझदार लोगों द्वारा यह स्वीकार्य नहीं होगा। मुस्लिम लीग तक भी इस बारे में अधिक उत्साहित नहीं होगी। यह इसलिए नहीं, क्योंकि प्रस्ताव दोषपूर्ण है। बल्कि बात इसके विपरीत है। एक समाधान और है, जिसका अपना आकर्षण है। यह ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनी सार्वभौम सत्ता के प्रयोग से पाकिस्तान की स्थापना किया जाना है। जनता के मतदान द्वारा स्वीकृति की अपेक्षा यह समाधान क्यों बेहतर है, इसका कारण यह है कि यह सरल है और मतदान की प्रक्रिया की भांति इतनी अधिक व्यापक कार्रवाई की अपेक्षा नहीं रखता और जनमत की भांति अनिश्चय एवं अनिर्णय से मुक्त है। इसे प्राथमिकता प्रदान करने का एक और आधार है, अर्थात् इसका एक पूर्व उदाहरण है। इसका पूर्व उदाहरण आयरलैंड का दृष्टांत है, और तर्क यह है कि यदि ब्रिटिश सरकार ने अपनी सार्वभौम सत्ता के प्रभाव एवं बल द्वारा आयरलैंड का विभाजन कर अल्सटर को जन्म दिया, तो फिर ब्रिटिश सरकार भारत का विभाजन कर पाकिस्तान को जन्म क्यों नहीं दे सकती?
ब्रिटिश संसद विश्व में सर्वाधिक सार्वभौम संवैधानिक सभा है। डी.एल. होम, एक फ्रेंच लेखक ने आंग्ल संविधान का विवेचन करते हुए कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है, जिसे ब्रिटिश संसद न कर सकती हो सिवाय इसके कि वह पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष नहीं बना सकती। यद्यपि ब्रिटिश संसद की सार्वभौमिकता डोमीनियंस के मामलों में वेस्ट मिनिस्टर की कानूनी व्यवस्था द्वारा सीमित है, परंतु भारत के विषय में यह अब भी असीमित है। आयरलैंड की भांति कानून में ऐसा कुछ नहीं है जो ब्रिटिश सरकार को भारत का विभाजन करने से रोकता हो। वह ऐसा कर सकती है, परंतु क्या ऐसा करेगी? प्रश्न सत्ता का नहीं अपितु इच्छा का है।
जो ब्रिटिश सरकार से आयलैंड के पूर्व दृष्टांत का अनुकरण करने का आग्रह करते है, उन्हें यह पूछना चाहिए कि आयरलैंड को विभक्त करने की पे्ररणा ब्रिटिश सरकार को कहां से प्राप्त हुई? क्या यह ब्रिटिश सरकार की आत्मचेतना थी, जिसके परिणामस्वरूप उसने उक्त मार्ग की स्वीकृति प्रदान की? अथवा परिस्थितियों के वशीभूत होकर जबरन उसे ऐसा करने को विवश होना और झुकना पड़ा? आइरिश होमरूल के इतिहास के विद्यार्थी को स्वीकार करना पड़ेगा कि आयरलैंड का विभाजन आत्मचेतना