कौन निर्णय कर सकता है?
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का फल नहीं है, वरन परिस्थितियों का परिणाम है। इस बात का प्रायः स्पष्टतया अनुभव नहीं किया गया कि आयरलैंड के झगड़े से संबंधित कोई भी पार्टी आयरलैंड का विभाजन नहीं चाहती थी। अल्सटर-नेता श्री कार्सन भी विभाजन नहीं चाहते थे। कार्सन होम रूल के विरुद्ध थे, परंतु वे विभाजन के पक्ष में नहीं थे। उनका प्रथम और मुख्य कार्य होम रूल का विरोध करना और आयरलैंड की अखंडता को कायम रखना था। होम रूल को जर्बदस्ती लादने के विरुद्ध आत्मरक्षा की यह द्वितीय पंक्ति थी कि उन्होंने विभाजन का आग्रह किया। कामंस के भीतर और बाहर दोनों स्थानों के उनके भाषणों से उक्त कथन बिल्कुल स्पष्ट हो जाएगा। दूसरी ओर, एसक्विथ की सरकार भी समान रूप से विभाजन के विरुद्ध थी। यह आयरलैंड के होम रूल विधेयक 1927 पर कामंस के सदन में हुई कार्रवाई में देखा जा सकता है। बिल के प्रावधानों में से अलस्टर को बाहर रखने के लिए दो संशोधन उपस्थित किए गए, एक बार कमेटी स्तर पर सर रोबर्ट्स द्वारा और पुनः तृतीय वाचन पर स्वयं श्री कार्सन द्वारा। दोनों बार सरकार ने विरोध किया और संशोधन गिर गये।
श्री लॉयड जार्ज के 1920 के गवर्नमेंट ऑफ आयरलैंड एक्ट द्वारा स्थायी विभाजन पूरा हुआ। अनेक लोग यह सोचते हैं कि यह मिली-जुली सरकार में, जिसके श्री लॉयड जार्ज नाममात्र के मुखिया थे, कंजरवेटिंव-यूनियनिस्टों की आज्ञा का प्रतिफल है। यह सत्य हो सकता है कि श्री लॉयड जार्ज अपनी मिलीजुली सरकार में सम्मिलित पार्टी के प्रभाव के वशीभूत थे, परंतु यह सत्य नहीं है कि विभाजन का सर्वप्रथम विचार 1920 में उत्पन्न हुआ। न ही यह सत्य है कि लिबरल पार्टी में कोई परिवर्तन नहीं हुआ और इसके परिणामस्वरूप पार्टी ने विभाजन को एक संभाव्य समाधान के रूप में स्वीकार करने की तत्परता दिखाई। वास्तव में विभाजन समाधान के रूप में लॉयड जार्ज के अधिनियम से 6 वर्ष पूर्व हुआ, जब एसक्विथ सरकार एक विशुद्ध लिबरल सरकार थी। वह वास्तविक कारण, जिसके फलस्वरूप आयरलैंड का विभाजन हुआ, उन तथ्यों पर गौर करके समझा जा सकता है, जिनके फलस्वरूप श्री एसक्विथ की सरकार के सोच में परिवर्तन हुआ। मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूं कि वह सूत्र, जिसके परिणामस्वरूप लिबरल सरकार की विचारधारा में उक्त परिवर्तन हुआ, सैनिक विद्रोह था, जो 1914 में हुआ और जिसका संबंध ‘कुर्राघ घटना’ से है।
वर्ष 1913 के अंत, तक आयरिश होम रूल विधेयक सभी चरणों से पारित हो गया। श्री एसक्विथ को इस बात की चुनौती दी गई कि यह कार्यवाही मतदाताओं का मत प्राप्त किए बिना ही हुई है। श्री एसक्विथ को यह आश्वासन देना पड़ा कि जब तक चुनाव नहीं होते, अधिनियम लागू नहीं किया जाएगा। यदि युद्ध नहीं होता तो सामान्य तौर पर चुनाव 1915 में होने थे। परंतु अलस्टरमैन इसके लिए चुनाव में मौका