कौन निर्णय कर सकता है?
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क्या महामहिम सरकार भारत में उसी पुनरावृत्ति पर निर्भर हो सकती है, जिसे उसने आयरलैंड में किया? मैं इस प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूं। परंतु दो बातें कहूंगा। पहली बात यह है कि महामहिम सरकार आयरलैंड के विभाजन के परिणामों से पूर्णरूपेण अवगत है। आइरिश स्वतंत्र राज्य ब्रिटिश सरकार का एक उत्कट विरोधी एवं बेमेल शत्रु हो गया है। शत्रुता की कोई सीमा नहीं होती। विभाजन के परिण् ामस्वरूप हुआ घाव कभी भी नहीं भरता। आयरलैंड का विभाजन नैतिक रूप से अरक्षणीय होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि यह जनता की इच्छा के अनुसार नहीं था, बल्कि उच्चशक्ति की इच्छा पर आधारित था। यह इतना बुरा था जितना कि मेकबेथ द्वारा डंकन की हत्या। महामहिम सरकार पर लगे खून के धब्बे उतने ही गहरे थे, जितने लेडी मैकवेथ पर और जिसके विषय में लेडी मैकवेथ ने कहा था फ्अरब की समस्त सुगंधियां उस दुर्गध को हटाने में असफल रहींय्। महामहिम की सरकार दूसरे विभाजन का दायित्व लेना नहीं चाहती, यह फिलिस्तीन में यहूदी अरबों के साथ अपनाई गई उसकी नीति से स्पष्ट है। इसने जांच के लिए ‘पील आयोग’ की नियुक्ति की। आयोग ने फिलिस्तीन के विभाजन की सिफारिश की। सरकार ने अवरोध को हल करने की एकमात्र अत्यधिक आशापूर्ण रूपरेखा के रूप में इसे सिद्धांतः स्वीकार कर लिया।ऽ एकाएक सरकार ने अरब लोगों पर इस हल को लादने की गंभीरता को समझा और ‘बुडहेड कमीशन’ नामक एक दूसरा रॉयल कमीशन नियुक्त किया, जिसने बंटवारे की भर्त्सना की और सरकार के लिए, जो एक भयंकर स्थिति से मुक्त होने की उत्सुक थी, एक आसान रास्ता खोल दिया। आयरलैंड का बंटवारा कोई ऐसा पूर्व दृष्टांत नहीं है, जो अनुसरण योग्य हो। यह एक भद्दी घटना है, जिससे बचा जाना चाहिए। यह एक चेतावनी है, कोई उदाहरण नहीं। मुझे इसमें बहुत संदेह है कि महामहिम की ब्रिटिश सरकार मुस्लिम लीग के कहने पर अपने अधिकार से भारत का विभाजन करेगी।
और महामहिम की सरकार मुस्लिम लीग की बात क्यों माने? अलस्टर के मामले में तो एक ऐसा रक्त संबंध था जिसके कारण ब्रिटिश राजनीतिज्ञों के एक शक्तिशाली वर्ग ने अलस्टर का पक्ष लिया। इसी रक्त संबंध के कारण लार्ड कर्जन ने कहा था, फ्तुम अलस्टर को अपने वर्तमान पति को तलाक देने के लिए मजबूर कर रहे हो, जिसके प्रति वह वफादार है और उसे एक अन्य से विवाह करने के लिए विवश कर रहे हो, जिसे वह दिल से नापसंद करती है, और जिसके साथ नहीं रहना चाहती।य् महामहिम की सरकार और मुस्लिम लीग के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं है और लीग को यह आशा करना व्यर्थ है कि महामहिम की सरकार उसका पक्ष लेगी।
ऽ देखें संसदीय वाद-विवाद (कामंस), 1938-39, खंड-341, पृष्ठ-1987-2107 और लार्ड्स, 1936-37,
खंड-106, पृष्ठ-599-674