उपसंहार
यहां मैं अपनी बात समाप्त करता हूं। इस विषय में जो भी कुछ मैं कहना चाहता था, वह मैं सब कह चुका हूं। कानूनी भाषा में, मैंने कानूनी बहस लंबी खींची है और तर्क दिये हैं। ऐसा करने में मैने अति दीर्घ, अति विस्तृत प्रणाली का अनुकरण किया है, जो विक्टोरियन वकीलों को बेहद प्रिय है, जिसके अंतर्गत दोनों पक्ष एक दूसरे की दलीलों, वादी-प्रतिवादी के प्रत्युत्तरों, खंडनों, प्रतिवादी के अधिक उत्तरों और अधिक खंडनों आदि में व्यस्त रहते हैं। मैंने यह जानबूझकर किया है, जिससे कि पाकिस्तान के पक्ष अथवा विपक्ष में पूर्ण एवं स्पष्ट राय बन सके। पूर्वगामी पृष्ठ दलीलों से युक्त हैं। मेरी सर्वोतम जानकारी और विश्वास के आधार पर उनमें निहित तथ्य सत्य हैं। मैंने अपने निष्कर्ष भी दिये हैं। अब हिंदू और मुसलमानों को भी अपने निष्कर्ष देने चाहिए।
उनके उक्त कार्य में उन्हें सहायता देने के लिए यह अच्छा होगा कि मुद्दे निर्धारित कर दिये जाएं। दलील के संदर्भ में निम्नलिखित मुद्दे आवश्यक प्रतीत होते हैं-
(1) भारत के राजनीतिक विकास के लिए क्या हिंदू-मुस्लिम एकता
आवश्यक है? यदि आवश्यक है, तो हिंदू और मुस्लिम दो पृथक राष्ट्र होने
की नई विचारधारा के बावजूद क्या यह एकता संभव है?
(2) यदि हिंदू-मुस्लिम एकता संभव है, तो क्या इसे तुष्टिकरण
अथवा समझौते द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए?
(3) यदि यह तुष्टिकरण से प्राप्त की जाती है, तो वे कौन-सी नई
सुविधाएं हैं, जो मुसलमानों को दी जा सकती हैं और जिसके फलस्वरूप
उनका इच्छित सहयोग उनके अन्य हितों को हानि पहुंचाए बिना प्राप्त किया
जा सकता है?
(4) अगर यह समझौते द्वारा किया जाना है, तो उस समझौते की
शर्तें क्या हैं? यदि मात्र दो विकल्प हैं, अर्थात् पाकिस्तान और हिंदुस्तान के
रूप में भारत का विभाजन, अथवा दो संविधान-सभाओं, कार्यपालिकाओं